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बलिया : कोरोना संक्रमण की भयावहता बीच प्रधानाध्यापिका अन्नू सिंह की खास अपील, 'चलों चले...'


प्रकृति एक ऐसा शब्द, जो मन-मस्तिष्क में एक अजीब सा उमंग भर जाता है। कानों में चंचल हवाओं का शोर, चिड़ियों की चहचहाने की आवाज मधुर संगीत सा लगती है। रंगा-रंग फूलों का चित्रण उनकी मंत्रमुग्ध खुख्बू, आमों की मंजरियों की मीठी सी महक शरीर के साथ-साथ आत्मा को भी नयापन से भर देती है। वर्तमान परिवेश में चाहे हम कितने भी एशो-आराम से रह ले, परंतु जीवन को जीवंत करने का असली मजा हमें प्रकृति की गोद में ही मिलती है। 

प्रकृति ईश्वर द्वारा बनाई गई धरती की साजोसज्जा है, जिसे उसने हमारी जरूरतों के अनुसार बनाया। लेकिन दुर्भाग्यवश हम मानव उसे अस्वीकार करते रहे। नित नए प्रयोग करते चले गए, जिसका दुष्परिणाम आज खुद मानव ही भुगत रहा है। वर्तमान में ग्लोबल वार्मिंग बढ़ता चला जा रहा है। इस बात का हमें अंदेशा नहीं कि हम मानव सुख-सुविधा के नाम पर दु:ख की बहुत बड़ी खाई तैयार कर रहे हैं। इसका जीता जागता उदाहरण कोरोना महामारी है। 

एक ऐसी संक्रामक बीमारी जो प्रतिदिन जाने कितने जिंदगियों को अपने आगोश में ले रही है। इस बीमारी से लड़ने के लिए जिस रोग प्रतिरोधक शक्ति को बढ़ाने की बात कहीं जा रही है, उसे धरती के अवतरण के साथ ही प्रकृति ने हमें सिखाया था। परंतु जैसे-जैसे समय बीतता गया, हम मानव उसकी उपेक्षा करते चले गए। प्रकृति को अनदेखा कर कृत्रिम आबोहवा में मानव निर्मित परिवेश में सुकून ढूंढने लगे। सुखी जीवन का एक झूठा आवरण हमें सत्यता प्रतीत होने लगा।वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए मुझे बहुत दुख हो रहा है कि ऑक्सीजन की कमी से धरती पर लाशें बिछ गई। अपनों की जिंदगी के लिए हम ऑक्सीजन ढूंढ रहे हैं। खरीद रहे हैं, जबकि प्रकृति ने इस मूल्यवान चीज के लिए हमें थोड़ा ही करने कहा और हम असफल हो गए। ना स्वयं किए और ना ही जो किया, उसका सहयोग किये। मानव अपने सुख के लिए हमेशा प्रकृति को अस्वीकार करता रहा है। जिस ऑक्सीजन के लिए हम तिल तेल मर रहे हैं, अगर पेड़-पौधों से हम दोस्ती कर ले तो शायद फिर से हमारी धरती का कायाकल्प हो जाए। हम सोचते हैं कि इतने तो पेड़ पौधे हैं, परंतु नहीं। हर एक मनुष्य पर कम से कम एक पेड़ होना चाहिए। मित्रों आज एवं भावी स्थितियों से निपटने के लिए हमें पुनः प्रकृति की शरण में जाना होगा। उसके दिए हर चीज को स्वीकार करना होगा। मानव निर्मित परिवेश से निकलकर अपने सुकृत्य से वायुमंडल को जीवंत करना होगा। जिस प्रकार तुलसी, नीम, पीपल, बरगद को हमने पूजनीय माना है, वैसे ही हर वृक्ष में ईश्वर की छवि को देखना होगा। यह वृक्ष मात्र एक वृक्ष नहीं, नीलकंठ का स्वरूप है, जो मानव द्वारा तैयार किए गए हर विष को पीकर जीवन दान देता है। यह पेड़ हमारे रक्षक हैं। हमें भी इनकी रक्षा की जिम्मेदारी उठानी चाहिए। अगर जरूरत वश कहीं एक पेड़ कटता भी है तो हम खाली जगहों पर कम से कम दो पेड़ लगाएं। यही वह वरदान है, जो हमें जीवनदान दे सकता है। अंततः यही कहूंगी दोस्तों अगर जीना है तो क्षमा याचना कर पुनः चलो प्रकृति की ओर चले।

अन्नू सिंह
प्रधानाध्यापिका
प्राथमिक विद्यालय बघेजी
शिक्षा क्षेत्र-हनुमानगंज, बलिया

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