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जानें कौन है... कोरोना की गेमचेंजर 2-डीजी दवा बनाने वाले बलिया के लाल डा. एके मिश्र


बलिया। दुनिया कोरोना की वैक्सीन बनाने व बांटने में लगी है। इस बीच, भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने कमाल करते हुए कोरोना की दवा बना दी है। केन्द्र सरकार ने इसके आपात इस्तेमाल की मंजूरी भी दे दी है।कोविड रोधी दवा 2-डीऑक्सी-डी-ग्लूकोज या 2-डीजी डीआरडीओ द्वारा हैदराबाद स्थित डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज के साथ मिलकर विकसित की गई है। कोरोना वायरस की 2-डियोक्सी-डी-ग्लूकोज (2-डीजी) दवा इस समय पूरे देश में सुर्खियों में है। क्लिनिकल परीक्षण के मुताबिक यह दवा अस्पताल में भर्ती मरीजों को तेजी से ठीक होने में काफी मदद करती है। इसके अलावा मरीजों की अतिरिक्त ऑक्सीजन पर निर्भरता को भी कम करती है। यह दवा कोरोना संक्रमित कोशिकाओं की पहचान करती है। फिर अपना काम शुरू करती है।  विशेषज्ञों का कहना है कि यह दवा कोरोना मरीजों के लिए रामबाण  साबित हो सकती है। 
इस दवा को बनाने में डीआरडीओ के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अनिल कुमार मिश्र ने अहम भूमिका निभाई है, जो यूपी के बलिया जिले के निवासी है। सिकंदरपुर तहसील क्षेत्र के मिश्रीचक गांव निवासी विजय शंकर मिश्रा व सुशीला मिश्रा के घर जन्मे डॉ. अनिल कुमार मिश्रा ने प्राथमिक शिक्षा जूनियर हाई स्कूल सिकन्दरपुर, हाईस्कूल राष्ट्रीय इंटर कालेज सन्दवापुर व इंटरमीडिएट मिर्जापुर से पास की।1984 में गोरखपुर यूनिवर्सिटी से एमएससी तथा 1988 में बीएचयू से रसायन विज्ञान से पीएचडी की डिग्री हासिल की। फिर डा. मिश्र फ्रांस के बर्गोग्ने विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रोजर गिलार्ड के साथ तीन साल के लिए पोस्टडॉक्टोरल फेलो थे। कुछ दिन तक वो प्रोफेसर सीएफ मेयर्स के साथ कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में भी पोस्टडॉक्टोरल फेलो रहे। 1994 से 1997 तक नांतेस, फ्रांस में प्रोफेसर चताल के साथ अनुसंधान वैज्ञानिक रहे डॉ. मिश्र 1997 में ही वरिष्ठ वैज्ञानिक के रूप में डीआरडीओ के इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूक्लियर मेडिसिन एंड एलाइड साइंसेज में शामिल हुए। 2002 से 2003 तक जर्मनी के मैक्स-प्लैंक इंस्टीट्यूट में विजिटिंग प्रोफेसर रहे डॉ. मिश्र के नेतृत्व में वैज्ञानिको ने उल्लेखनीय सफलता पाई है। डीआरडीओ के वैज्ञानिक डॉ. एके मिश्रा के दावे के मुताबिक, किसी भी वायरस की ग्रोथ होने के लिए ग्लूकोज का होना बहुत जरूरी है। जब वायरस को ग्लूकोज नहीं मिलेगा, तब उसके मरने की चांसेस काफी बढ़ जाते हैं। इस वजह से वैज्ञानिकों ने लैब में ग्लूकोज का एनालॉग बनाया, जिसे 2डीआरसी ग्लूकोज कहते हैं। इसे वायरस ग्लूकोज खाने की कोशिश करेगा, लेकिन यह ग्लूकोज होगा नहीं। इस वजह से उसकी तुरंत मौत हो जाती है। यही दवा का बेसिक प्रिंसिपल है।

पीएम ने किया था सम्मानित

1999 में भारत के प्रधानमंत्री ने डीआरडीओ के सबसे युवा वैज्ञानिक पुरस्कार से डॉ. अनिल कुमार मिश्र को सम्मानित किया था। डॉ. मिश्र इस समय रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) के साइक्लोट्रॉन और रेडियो फार्मास्यूटिकल साइंसेज डिवीजन में काम कर रहे हैं। डॉ. अनिल रेडियोमिस्ट्री, न्यूक्लियर केमिस्ट्री और ऑर्गेनिक केमिस्ट्री में रिसर्च करते हैं। उनकी वर्तमान परियोजना ‘आणविक इमेजिंग जांच का विकास’ है।

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