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बलिया : प्रकृति का चौतरफा हमला, बढ़ती जा रही बाढ़ पीड़ितों के दर्द की चादर


मझौवां, बलिया। कहते हैं वक़्त हर जख्म को भर देता है। लेकिन अफसोस, लगातार बढ़ती मुश्किलें बाढ़ पीड़ितों के दर्द की चादर को चौड़ी ही करती जा रही है। उनके सामने खाने-पीने से लेकर रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने तक की समस्या आ खड़ी हुई है। बाढ़ के बाद आग, फिर सर ढ़कने को मिले प्लास्टिक का टुकड़ा आंधी में उड़ने से ये पीड़ित अब पूरी तरह टूट चुके है। हर संभव मदद करने का वादा करने वाली सरकार के दावों पर भी पीड़ितों को अब भरोसा नहीं है, क्योंकि जिम्मेदार अधिकारी हर रोज पैंतरा बदलते रहते है। 
गौरतलब हो कि गंगा नदी की बाढ़ से बेघर बैरिया तहसील क्षेत्र की ग्राम पंचायत गोपालपुर के दर्जनों पीड़ित दूबेछपरा ढ़ाले के पास सड़क किनारे झुग्गी-झोपड़ी डालकर गुजारा कर रहे थे। लेकिन जिस आशियाने को वे तिनका-तिनका जोड़कर बनाये थे, उसे शनिवार की रात अग्निदेव ने जलाकर राख कर दिया। रविवार को समाज के अग्रणी लोगों ने प्लास्टिक का तिरपाल व भोजन-पानी का इंतजाम किया। प्लास्टिक के तिरपाल के नीचे रविवार की रात पीड़ित किसी तरह सो रहे थे, तभी सोमवार की भोर में आई आंधी इन पीड़ितों के सिर से प्लास्टिक का छ्प्पर भी उड़ा ले गई। पीड़ितों के मासूम बच्चे सोमवार को सूर्य की तपिश बीच तपते दिखे। पीड़ितों और उनके मासूमों की हालत देख हर किसी की आंखों का कोर भींग गया। पीड़ितों ने जो अपनी हालत बयां की, उसे सुन लोगों के रोंगटे खड़े हो गये। 

दर्द बयां कर रो पड़ा पीड़ित

पीड़ित किशुन चौधरी ने बताया कि पहले तो गंगा ने सब कुछ छीन लिया। किसी तरह जिंदगी पटरी पर आ रही थी, लेकिन वर्ष 2020 में आग की लपटों ने सब कुछ जलाकर राख कर दिया। जैसे तैसे जिंदिगी की गाड़ी आगे बढ़ रही थी, तभी शनिवार की रात में लगी आग ने सब कुछ जलाकर नष्ट कर दिया। किशुन ने बताया कि अपने पांच बेटियों के साथ किसी तरह गुजर बसर कर रहा था। पाई पाई जुटाकर घर गृहस्थी चला रहा था। सोच रहा था कि इस साल किसी तरह एक बेटी की शादी करूंगा, लेकिन आग ने सारे उमीद व मेहनत की कमाई पर पानी फेर दिया। यह तो बानगी भर है। कई ऐसे किशुन है, जिनकी हालत बदतर हो गई है। मासूम दो जून की रोटी के लिये बिलबिला रहे है।

हरेराम यादव

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