बलिया के शिक्षक की रचना : नवरंग चढ़ा वासंतिक चहुंओर, शगुन-लगन के...


चलो मनाएं नव वर्ष

नव वर्ष मनाए मिल प्रकृति भी,
पपीहा-कोयल के मृदु स्वर से। 
पीले सरसों चना, गेहूं अरु अरहर के फर से।
गंध रंग मुस्कान विविध, भाँति-भाँति के फूलों से,
कामिनी बेला अर्जुन कनेर, गुड़हल अशोक जूही केसर से।
चलो मनाएं नव वर्ष मिल, 
पपीहा-कोयल के मृदु स्वर से।

पतझड़ विरही मिल सजे वसंत में,
मदमस्त महुआ, जामुन आम्र बेर बौर से।
दुल्हन हुई पादप लता ताम्र भी,
चढ़ा निखार रूप यौवन से। 
ऋतुराज बारात आ गई, 
मधुमास की याद आ गई। 

ढोल मृदंग झाल सज गए,
राग-फाग के ताल सज गए।
नवरंग चढ़ा वासंतिक चहुंओर, 
शगुन-लगन के साल चढ़ गए।
चलो मनाएं संवत विक्रमी अब,
पपीहा-कोयल के मृदु स्वर से। 

नवमी राम-राज आ गए, 
मर्यादा धर्मराज आ गए। 
महाभारत के ताज आ गए, 
युधिष्ठिर के राज आ गए। 
निर्भय मनाएं नव संवत्सर सब,
पपीहा कोयल के मृदु स्वर से।

निर्भय नारायण सिंह
शिक्षक एवं साहित्यकार, बलिया

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