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देश सेवा का जज्बा और जलालत : बिहार में पकड़े गये यूपी के कई युवा


मुजफ्फरपुर। 24 से 48 घंटे पहले घर से बैग में रूखा-सूखा लेकर निकल गए। रात किसी तरह मच्छरों के बीच स्टेशन पर गुजर गयी। आधी रात को नींद खुली, तो सीधे आर्मी के भर्ती कैम्प पहुंच गए। लेकिन यहां न केवल सपनों और उम्मीदों को झटका लगा, बल्कि जलालत भी झेलनी पड़ी। पुलिस ने चोरों की तरह बैठाकर घंटों पूछताछ की। यह नजारा है यूपी के पड़ोसी राज्य बिहार का, जहां सेना भर्ती में आने वाले युवकों को बाहरी कहकर बाहर कर दिया जाता है। हां, गलती तो युवकों ने की है। निवास सहित अन्य फर्जी सर्टिफिकेट बनवा कर आ जा रहे है। लेकिन इसकी नौबत क्यों आयी, इस पर हमारे माननीयों को कभी गंभीरता से सोचना होगा।

मुजफ्फरपुर के चक्कर मैदान में देश सेवा का जज्बा लिए हजारों युवक रोजाना पहुंच रहे हैं। यहां करीब पखवारे भर से सेना की भर्ती चल रही है। पहले उत्तर बिहार के जिलों की भर्ती थी। अब सोनपुर रीजन के जिलों की चल रही है। हजारों तो भर्ती के मानकों में छंट कर बाहर हो जाते हैं, लेकिन तमाम ऐसे भी है, जो बिना दौड़ लगाए ही बाहर हो जाते हैं। ऐसे युवा यूपी के रहने वाले ही है। 27 फरवरी से हर रोज 500-700 युवक पकड़े जाते हैं। बलिया, गाजीपुर, मऊ, आजमगढ़, देवरिया सहित अन्य जिलों के। हालांकि पूछताछ के बाद शाम तक उन्हें छोड़ दिया जाता है। पिछले हफ्ते दफ्तर में था, फर्जी युवकों के पकड़े जाने की खबर पर चर्चा चल रही थी। तभी एक साथी ने पूछा, भैया यूपी के इतने लड़के क्यों आ रहे। मैं निरुत्तर था। वैसे सही जवाब तो था बेरोजगारी, लेकिन मैंने देश सेवा का जज्बा और यूपी में फिलहाल कोई भर्ती नहीं होने की बात कहकर अपनी लाज बचाने की कोशिश की। हां, वह कितना संतुष्ट हुआ, यह वही जाने। वैसे देश सेवा भी सेना में जाने का सपना देखने वालों के लिए एक अहम पहलू होता है। और जिलों की तो नहीं बता सकता, लेकिन बलिया में युवाओं का जज्बा देखा है। सुबह चार बजे से फौज में जाने का सपना देखने वाले सड़क पर होते है। लम्बी दौड़ और घंटों कसरत में पसीना बहाते है। बैरिया इंटर कॉलेज के मैदान में तो मेला लगता है। अभी कुछ साल पहले बिहार में बीपीएससी ने डिग्री कॉलेज के शिक्षकों की भर्ती की, यूपी के युवाओं ने अधिकतर सीट कब्जा लिये थे। राज्य सरकार की कई भर्तियों में तो केवल बिहार के निवासियों को ही आवेदन की अनुमति है। लेकिन, सेना की भर्ती में इस नियम पर अचरज भी होता है।

धनंजय पांडेय 'धनजी' 

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