चार साल में बलिया न्यायपीठ ने 653 बच्चों को दी नई जिन्दगी



बलिया। बच्चों का शोषण न हो और उन्हें समुचित न्याय मिले... इसको लेकर सरकार का एक कानून है किशोर न्याय। इस अति महत्वपूर्ण वैधानिक निकाय का मुख्य कार्य बच्चों के हित का प्रभावी क्रियान्वयन/मानीटरिंग करना है। या यूं कहे तो बाल मजदूरी, बाल विवाह, बाल दुर्व्यवहार, बाल यौन शौषण या फिर अन्य किसी कठिन परिस्थितियों मे बच्चा पाया जाता है तो पीड़ित बच्चे को न्याय के लिए किशोर न्याय अधिनियम की धारा 27 की उपधारा (1) के अनुसार जिले मे एक न्यायपीठ बाल कल्याण समिति का गठन हुआ है। समिति में एक अध्यक्ष व चार सदस्य होते है। इसमें एक महिला सदस्य होती है।
जिले में स्थापित न्यायपीठ परिवार से बिछङे, घर से भागे या माता पिता द्वारा परित्यक्त बच्चों के तारणहार के रूप मे कार्य कर रही है। किशोर न्याय अधिनियम के तहत न्यायपीठ हर महीने दर्जन भर लावारिस बच्चों को नया जीवन दे रही है। बिछङे बच्चों को उनके परिवार से मिला रही है। इससे न सिर्फ बच्चों का जीवन संवर रहा है, बल्कि परिवार उजड़ने से भी बच रहा है। जिले में आये दिन नवजात बच्चे लावारिस हालत में मिलते रहते हैं। पुलिस व चाईल्ड लाईन ऐसे बच्चों को न्यायपीठ बाल कल्याण समिति के सामने प्रस्तुत करती है। अभिभावक मिल गये तो उन्हें बुलाकर कागजी कार्रवाई के बाद उनके बच्चों को सौंप दिया जाता हैं। नहीं मिले तो उन्हें शिशुगृह या बालगृह के सरक्षण में दे दिया जाता है। अभिभावक अपने बच्चे को प्राप्त करना चाहेंगे तो उन्हें कानूनी प्रक्रिया पूरी करनी होती है। अगर कोई व्यक्ति बच्चा गोद लेना चाहता है तो केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण की साइट पर आनलाईन आवेदन कर बचा गोद ले सकते है।

चार साल में निपटे 653 मामले : राजू सिंह

न्यायपीठ बाल कल्याण समिति बलिया के न्यायिक सदस्य राजू सिंह ने बताया कि जनवरी 2017 से आज तक 653 मामले न्यायपीठ द्वारा निपटाये जा चुके है। हर महीने 15 से 20 बच्चे विभिन्न माध्यमों से प्रस्तुत किए जाते है। किशोर न्याय अधिनियम के तहत कार्रवाई कर परिवार या चाईल्ड केयर संस्था को सौंपा जाता है।

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