'बूढ़ा दिसम्बर जवां जनवरी के...' सोशल मीडिया पर खूव वायरल हो रही यह गुनगुनी पोस्ट


उम्र की डोर से फिर 
एक मोती झड़ रहा है...
तारीख़ों के जीने से 
दिसम्बर फिर उतर रहा है...
कुछ चेहरे घटे, चंद यादें 
जुड़ गए वक़्त में...
उम्र का पंछी नित दूर और 
दूर निकल रहा है...
गुनगुनी धूप और ठिठुरी 
रातें जाड़ों की...
गुज़रे लम्हों पर झीना-झीना 
सा इक पर्दा गिर रहा है...
ज़ायका लिया नहीं और
फिसल गई ज़िन्दगी...
वक़्त है कि सब कुछ समेटे
बादल बन उड़ रहा है...
फिर एक दिसम्बर गुज़र रहा है..
बूढ़ा दिसम्बर जवां जनवरी के कदमों में बिछ रहा है...
लो इक्कीसवीं सदी को इक्कीसवां साल लग रहा है। 

साभार : सोशल मीडिया

Post a Comment

0 Comments