किसान आंदोलन के बीच बलिया के शिक्षक ने की मार्मिक रचना


बदहाल किसान


हे! किसान, हे! अन्नदाता यह धीरज कहां से लाते हो,
खुद कर्जे में डूबकर कैसे, लोक-भरण तुम करते हो। 
जी-तोड़ परिश्रम तुम करते, पर ! सजी थाली महलों पर,
दो-जून निवाले मुश्किल फिर भी, मुस्कान लिए अधरों पर।

सर्दी पाला ओला तूफां बारिश, तपकर दिनकर आते,
आठों पहर रखवाली होती, फसलें वनचर पशुएं खाते।
दग्ध हिय अरु शस्य दवानल, प्यास खोद कूप बुझाते,
बुझी चिंगारी को लपट बनाने, फिर खद्दरधारी आते।

बिन आराम किसानी करते, वह कर्मशील कहलाते,
सामाजिकता में बंधे भू-स्वामी, मैत्रीभाव अपनाते। 
रुखा-सूखा खाते निश-दिन, पर ! ना सोते भूखे अपने,
सीमा पर भी धान्य पहुंचता, फ़कीर-भिक्षुक भी खाते।

ईमान से पक्के नादान खेतिहर, कृषि में खो जाते,
अक्सर सस्ते बेचते कर्मवीर ! कभी सस्ते बिक जाते।
आमदनी अच्छी मंडी में, सहज ही दलाली चंगुल में फंस जाते,
मुनाफाखोरी के चक्कर में भेंड़े, जैसे कसाई से मिल जाते।

निर्भय नारायण सिंह
शिक्षक, बलिया

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