'डाला छठ' पर बलिया के पत्रकार की खास रिपोर्ट, जानें इसका महत्व

 

मनियर, बलिया। बिहार एवं झारखंड से चला सूर्य उपासना का पर्व छठ पूरे भारत में धीरे-धीरे फैल गया है। नौकरीपेशा एवं रोजी रोजगार के लिए अन्य प्रांतों में गए लोग भी इस पर्व को अन्य प्रांतों में भी फैलाए हैं।महिलाओं के लिए यह पर्व विशेष महत्व रखता है। शादी विवाह के उत्सव की तरह इस पर्व में लोग बुजुर्गों को छोड़ बच्चों सहित पूरे परिवार के लोगों के लिए नए कपड़े खरीदते हैं। बिहार व झारखंड समेत पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोग बाहर से इस त्यौहार में अपने घर पहुंच जाते हैं, जो नहीं पहुंच पाते वह जहां हैं वहीं इस त्यौहार को मनाते हैं। 
महिलाओं के लिए यह व्रत काफी कठिन होता है। कुछ महिलाएं दो दिनों तक व्रत रहती है। यह व्रत कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष में चतुर्थी तिथि से शुरू होकर सप्तमी तिथि की सुबह समाप्त होता है। इस व्रत के प्रारंभ होने से पूर्व औरतें पूरे घर की साफ सफाई करती है। चतुर्थी तिथि से नहाय खाय के बाद यह व्रत शुरु होता है। पंचमी तिथि को खरना व्रत होता है। दिन भर व्रत रहने के बाद महिलाएं शाम को कद्दू (लौकी) के साथ सात्विक भोजन ग्रहण करती है। फिर शुरू होता है षष्ठी का व्रत। शाम को महिलाएं छठ घाट पर पूजन उपरांत डूबते सूर्य को अर्घ देती है। फिर पूरी रात निर्जला व्रत रहने के बाद सप्तमी तिथि को उगते सूर्य को अर्घ देने के बाद यह व्रत समाप्त होता है। इस पर्व को प्रकृति प्रेम या प्राकृतिक पूजा भी कहा जाता है। सूर्य उपासना का बहुत ही सनातन धर्म में धार्मिक महत्व है। सूर्य उपासना से शारीरिक एवं मानसिक रोगों से मुक्ति मिलती है, जो लोग सूर्यास्त से पहले स्नान कर सूर्य को अर्घ्य देते हैं उन्हें ऊर्जा प्राप्त होता है। सूर्य प्रत्यक्ष देव है, जिनका हमारे जीवन में बहुत ही महत्व है। 



वीरेंद्र सिंह, वरिष्ठ पत्रकार मनियर, बलिया 

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