मासूम सवाल ने बलिया के इस पत्रकार को किया निरूत्तर, आप जबाब दें पायेंगे क्या ?



#बेटियां...
#या देवी सर्वभूतेषु

#सब लोग ससुराल का नाम लेकर ही क्यों डराते हैं...?
बड़ा ही मासूम-सा सवाल था, लेकिन निरूत्तर कर दिया मुझे। घंटों लग गए, लेकिन जवाब नहीं सूझा। 
आजकल एक वीडियो वायरल हो रहा है। बेटी को जगाने के लिये मां डराती है कि ससुराल में सुबह 5 बजे उठना पड़ेगा। घर का काम करना पड़ेगा, सुबह नाश्ता बनाना पड़ेगा। वो तो बोल देंगे कि माँ-बाप ने कोई संस्कार नहीं दिया, कुछ सिखाया नहीं।

सच, आखिर ससुराल जाना है, तो क्या डरना जरूरी है। कहीं ऐसा तो नहीं कि हम मजाक में ही ससुराल के नाम पर या बेटी के नाम पर ऐसी लक्ष्मण रेखा खींच दे रहे, जिससे बाहर निकलने के लिये वह जीवन भर छटपटाती है। तमाम सुनहरे सपनों के बावजूद मन के किसी कोने में डर ने जगह बना लिया होता है। 

सवाल यह भी उठता है कि माँ-बाप बेटों को क्यों नहीं बचपन से ही सिखाते कि इंसान नहीं बनोगे तो तुम्हारे कारण किसी की जिंदगी बर्बाद होगी। शायद इसलिये, कि वह बेटा है। लेकिन यह भी सच्चाई है जितना बेटी के बर्ताव पर उसकी ससुराल की खुशी निर्भर होती है, उतना ही बेटे के बर्ताव पर उसके ससुराल की। भले ही बात छोटी है, लेकिन अब यह राष्ट्रीय चिंता बन गयी है। बेटियों को यह अहसास कराना जरूरी है कि वह किसी मामले में बेटों से कम नहीं। सरकार भी इसको लेकर चिंतित है। 

केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय के निर्देश पर सीबीएसई ने लैंगिक भेदभाव खत्म करने के लिये सभी स्कूलों को पत्र भेजा है। कहा है कि कथा-कहानियों के माध्यम से बेटियों को भी नायक के रूप में प्रस्तुत किया जाय। किसी भी हाल में यह नहीं लगे कि बेटियां किसी से कम है। सरकार ने स्कूलों को ही जिम्मेदारी दी है कि अभिभावकों को भी इसके लिये जागरूक करें।

बहरहाल, इस नवरात्रि हम उम्मीद कर सकते हैं कि बेटियों को आने वाले वक्त में बराबरी का दर्जा मिलेगा। सरकार तो अपनी जिम्मेदारी निभा ही रही है। अभी उत्तर प्रदेश की सरकार ने #मिशन_शक्ति शुरू किया है। बेटियों की सुरक्षा और आत्म निर्भरता ही मुख्य उद्देश्य है।

बस आप और हम भी अपनी जवाबदेही समझ लें, तो निश्चित ही एक स्वर्णिम युग की शुरुआत हो सकेगी।

धनंजय पांडेय, वरिष्ठ पत्रकार बलिया की फेसबुकवाल से

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