कद्दावर और करिश्माई व्यक्तित्व के स्वामी थे बच्चा पाठक



बलिया। राजनीति में नेता-जनता में मूलतः मालिक-नौकर के रिश्ते जैसा कुछ नहीं होता। आदर्शतः एक नेता व जनता का सम्बंध परिवार की तरह होता है। वह उसी मुखिया की तरह सर्व समाज का खयाल रखता है। कभी-कभी वह उन्हें ग़लतियों के लिए ज़िम्मेदार ठहराता है, कभी माफ भी करता है। कभी उनको नाखुश करता हैं  तो कभी स्नेह का एहसास भी कराता है। स्व. पंडित बच्चा पाठक जिन्हें क्षेत्र के लोग सामान्यतः 'बाबा' कहकर ही पुकारते थे। उन्होंने भी जीवन को इसी उपर्युक्त ढर्रे पर जिया...। चाहें गांव, क्षेत्र की जनता हो या विद्यालय परिवार हो वो हर एक की सहायता को हमेशा तत्पर रहते थे। वह लगते थे तो पूरे मनोयोग और मजबूती से लगते थे। वह जो ठान लेते थे, मजाल नहीं कि कोई अवरोध उनका रास्ता रोक दे। हम कह सकते हैं कि बाबा कद्दावर और करिश्माई व्यक्तित्व के स्वामी थे। 

रेवती ब्लाक के खानपुर गांव के रहने वाले बच्चा पाठक जी के प्रारम्भिक राजनैतिक कदम डुमरिया न्याय पंचायत के संरपच के रूप में साल 1956 में पड़े। उनका अगला राजनैतिक सफर 1962 में बलिया जिले के रेवती के ब्लाक प्रमुख चुने जाने के बाद 1966 से प्रारम्भ Kहुआ था। तत्पश्चात 1967 में पहली बार कांग्रेस के बांसडीह विधान सभा क्षेत्र से प्रदेश की राजनीति में कदम रखते हुए 1969 में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़कर जीत हासिल की। तब से वह पीछे मुड़ कर नहीं देखे। विधानसभा चुनाव 1971, 1974, 1977 एवं 1980 में उन्होंने लगातार जीत दर्ज कर बांसडीह का नेतृत्व किया। पुन: बांसडीह से 1991 एवं 1996 में वे लगातार कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतकर मिशाल कायम की। एक ही विधानसभा से एवं एक ही पार्टी से सात बार विधायक बनने का रिकार्ड बलिया में बच्चा पाठक के नाम रहा। 1977 की जनता पार्टी की लहर में भी वह चुनाव जीत कर काफी चर्चित रहे। तभी से कांग्रेस जनों ने उन्हें 'शेरे बलिया' कह कर पुकारना शुरू किया।

नेतृत्वकला एक गुणवत्ता है जो चयनित लोगों में ही निहित होता है। कुछ लोगों को समय और प्रयासों से प्राप्त होता है। बाबा में यह कला ईश्वर प्रदत्त थी। बाबा का जीवन मूलतः राजनैतिक रहा पर फिर भी वह अपने विद्यालयों के प्रति आजीवन समर्पित भाव कार्य करते रहे। उनकी नजर हमेशा अपने चारों विद्यालयों के मजबूत प्रबन्धन व अपने कर्मचारियों पर रही। अपने व्यस्ततम क्षणों में से भी विद्यालयों के लिए समय निकाल लेते थे। अपने शिक्षकों व कर्मचारियों को लेकर कभी-कभी उनका तेवर तल्ख जरूर हुआ पर कभी उन्होंने किसी का बुरा नही किया। अपने लंबे राजनीतिक व प्रबन्धकीय सफर में बाबा ने लाखों लोगों की जिंदगी पर सार्थक असर डाला। उनके निधन से बलिया और पूर्वांचल ने एक सम्मानित और जनता के लिए समर्पित जननेता तो खो ही दिया। विद्यालय परिवार भी इस क्षति को हृदय से महसूस किया। ऐसे आत्मीय व्यक्तित्व की क्षतिपूर्ति तो संभव नही हो सकती थी, पर उनके बाद सहृदयता एवं कर्मठता से उनकी कमी को लगातार हमारे वर्तमान प्रबन्धक अशोक पाठक जी बखूबी पूरा करने का प्रयास करते आ रहे हैं। बाबा उन पुराने कांग्रेसियों में गिने जाते थे जो राजनीतिक फायदे और नुकसान नहीं, बल्कि वैचारिक तौर पर कांग्रेस से जुड़े रहे। कांग्रेस के बदहाली के समय में भी उन्होंने पार्टी को सींचने का पूरा प्रयास किया। बाबा को कम शब्दों में परिभाषित करने के लिए वाजपेयी जी की यह पंक्ति दृष्टव्य हैं....

"मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं, लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं?"


आज हमारे विद्यालय के जिम्मेदार अभिवावक, हम सभी के हितों के सच्चे संरक्षक, जागरूक प्रबन्धक व सच्चे अर्थों में बाबा की सोच के वाहक श्री अशोक पाठक जी के द्वारा उनकी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए स्व.पंडित बच्चा पाठक जी की स्मृति में पीडी इंटर कॉलेज गायघाट, बलिया के निर्मित प्रवेश द्वार का उद्घाटन किया गया। वैसे तो बाबा की ख्याति सर्वविदित है, पर प्रबन्धक अशोक पाठक  द्वारा किया गया यह पुनीत कार्य उनकी स्मृति को और मजबूती प्रदान करने की दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण व सार्थक कदम साबित होगा। कोरोना काल में आज के छोटे पर महत्वपूर्ण उद्घाटन समारोह में हमारे जिला विद्यालय निरीक्षक, क्षेत्र के कई विद्यालयों के प्रबंधक, विद्यालय प्रबन्ध समिति के सदस्यगण, चारों विद्यालयों के प्रधानाचार्य, अध्यापकगण व कर्मचारी तथा विद्यालय की शान NCC के कैडेट्स आदि ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति से इस क्षण को ऐतिहासिक बनाया। कार्यक्रम में आये सभी आगन्तुक . अतिथियों का विद्यालय परिवार ने स्वागत अभिनन्दन किया। कार्यक्रम की शुरुआत मां सरस्वती व बच्चा पाठक जी के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करते हुए की गयी। अध्यक्षता  रामराज तिवारी जी व संचालन धनञ्जय सिंह जी के द्वारा किया गया। प्रमुख वक्ताओं में नारायण जी सिंह, अरविंद गांधी, विजय ओझा, उमाशंकर पाठक, मदन पाण्डेय, सियाराम यादव, जनार्दन पाण्डेय, सौरभ पाठक, महावीर पाठक, राघवेंद्र प्रताप सिंह आदि ने अपने विचारों द्वारा कार्यक्रम में सहभागिता की। कार्यक्रम में अरुण पाठक, गोपाल जी पाठक, रणधीर सिंह, मनोज जी पाठक, समीर पाण्डेय, राजू सिंह, रणजीत ओझा, आशुतोष सिंह, सुभाष मिश्रा आदि अन्य गणमान्य लोग उपस्थित हुए।

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