बलिया : कितने बदनसीब है हम तेरे जहां में ऐ मालिक


रामगढ़, बलिया। कितने बदनसीब है हम तेरे जहां में ऐ मालिक... मर जाने के बाद भी तरसते है खुद की शिन्याखत को। उपरोक्त चंद दो लाइन में बैरिया तहसील क्षेत्र के गंगा कटानपीड़ित विस्थापितों का दर्द समझना आसान है। परन्तु विडम्बना यह है कि सत्ता मोह में अंधे जनप्रतिनिधियों की आंख में कभी रोशनी आती ही नहीं, ताकि वे इन पीड़ितों के  दर्द से वाकिफ हो सकें। 


राष्ट्रीय राज्य मार्ग-31 के किनारे झुग्गी झोपड़ियों में रह रहे इन कटान पीड़ितों पर हर समय हर तरह से खतरा मंडराते रहता है, लेकिन इन समस्याओं से अनिभिज्ञ  जनप्रतिनिधि व प्रशासनिक अधिकारी यूं धृतराष्ट्र की तरह आंखें बंद किये रहते है।रविवार की रात बेकाबू बोलेरो द्वारा तेतरी देवी पत्नी बिकाऊ गोड़, निवासी श्रीनगर को रौंदने के बाद ग्रामीणों द्वारा एनएच-31 पर जाम लगाना, इन कटान पीड़ितों के सब्र का पैमाना छलकना जाहिर करता है। जाहिर सी बात है कि ये कटान पीड़ित आखिर कब तक गंगा कटान पीड़ित पुनर्वास योजना से लाभवन्तित होंगे। कब तक यूं ही सड़क किनारे बंजारों के माफिक जीवन व्यतीत करते रहेंगे?


हर मौसम देता है टीस
गंगा कटान पीड़ितों का आज का ये दर्द नया नहीं है, बल्कि हर मौसम इनके नियति के साथ एक नया खेल अवश्य खेलता है। अभी गत वर्ष की ही बात है जब उदई छपरा निवासी कौशल्या देवी पत्नी स्व. अर्जुन तियर की पत्नी को सर्प ने डंस लिया और उनकी मृत्यु हो गई। कौशल्या देवी के पति अर्जुन की मृत्यु एक साल पूर्व एक सड़क दुर्घटना में हो गई थी। आज भी उनके पुत्र-पुत्रियां अनाथों का जीवन जी रहे है। एक वर्ष पूर्व ही श्रीनगर निवासी हरिजन बस्ती में आगलगी से झुग्गी-झोपड़ी तो जल ही गई, उसी झोपड़ी में एक अबोध बालिका भी जलकर मर गई। 


उपरोक्त घटनाएं तो केवल उदाहरण मात्र है। यदि गम्भीरता से देखा जाए तो सड़क किनारे रहने वाले इन कटान पीड़ितों के सर पर सदैव मौत मंडराती रहती है। प्रशासनिक अधिकारी समेत जनप्रतिनिधि इसी मार्ग से हूटर बजाते निकल जाते है, लेकिन इनकी समस्याओं पर कभी गौर भी नहीं करते। आलम यह है कि इनकी सुरक्षा के लिए सड़क किनारे कभी चेतावनी बोर्ड लगवाने की भी जरूरत महसूस नहीं की गई, ताकि वाहन चालक घनी आबादी का बोध कर अपना गति नियंत्रण में रखे।

रवीन्द्र तिवारी की खास रिपोर्ट

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