काश ! कोई बन जाता रहनुमा, गरीबी में तप रहा बलिया का यह परिवार


मनियर, बलिया। पीएम गरीब कल्याण अन्न योजना... पीएम आवास योजना... उज्ज्वला योजना... और भी कई ऐसी जनकल्याणकारी योजनाएं है, जो जरूरतमंदों के चेहरे पर मुस्कान देती है। इस योजना का लाभ पात्रों को मिले, इस पर प्रधान, सचिव, लेखपाल को नजर रखनी होती है। लेकिन अफसोस, जनप्रतिनिधियों और सरकारी मुलाजिमों की नजर आज तक बालकरन राजभर तक नहीं पहुंची। गरीबी और बेवशी के तपते रेगिस्तां में बालकरन का पांच सदस्यीय परिवार तड़प रहा है। विलख रहा है, लेकिन इस बदनसीब की आवाज सुनने को कोई तैयार नहीं है।
बालकरन राजभर का कुनबा मनियर ब्लाक की ग्राम पंचायत सरवार ककरघट्टी के पुरवा नावट नंबर एक में रहता है। 5 सदस्यों का परिवार सरकार की सभी सुविधाओं से वंचित है। आजादी के सात दशक बाद भी टूटी झोपड़ी, झोपड़ी के अंदर सीलन, एक तरफ उसमें मवेशी बांधे जाने के कारण कीचड़, फिर भी उसी झोपड़ी में रहने को यह परिवार मजबूर है। इन पांच सदस्यीय परिवार को भोजन  पानी तक का अकाल है। घर में 5 किलो वाला गैस चूल्हा है, लेकिन उस पर खाना पकता भी है तो कभी पड़ोसियों की दया पर तो कभी रिश्तेदारों की कृपा पर। किसी दिन भोजन नसीब होता है तो किसी दिन फांका रहना पड़ता है। 


एक यूनिट का राशन कार्ड था, लेकिन...

इनको राशन कार्ड भी मिला है, लेकिन सिर्फ एक यूनिट उस पर दर्ज है। इन लोगों द्वारा बताया जा रहा है कि वह भी यूनिट कट गया है। जिससे इनको राशन नहीं मिल पाता। यहां तक की कोरोना काल में भी इस गरीब परिवार को सरकार का गेहूं-चावल या चना, एक छटाक भी नहीं मिल सका है। 


काश ! इस गरीब के दर्द को कभी महसूस करता सरकारी अमला 

बरसात में झोपड़ी का एक बूंद पानी भी बाहर नहीं जाता। बारिश होने पर इन्हें अपने भाई के घर में शरण लेना पड़ता है। बारिश न हो तो सीलन युक्त झोपड़ी या खुले आसमान के नीचे जीवन यापन करना इनकी नियति बन चुकी है। बावजूद इसके सरकारी अमला इस गरीब के दर्द को महसूस करने की जहमत नहीं उठाई। यह गरीब परिवार कब तक किसी के भरोसे का मोहताज रहेगा ? क्या इसका जवाब प्रशासन के पास है ?

नहीं कर सका बेटी का श्राद्ध

बालकरन के परिवार में मां तेतरी देवी 80 वर्ष, पत्नी देवान्ती 50 वर्ष, बेटी मधु 13 वर्ष, पुत्र आनंद 8 वर्ष है। उनकी पत्नी देवंती देवी मनोरोग से ग्रसित है। बेटी मधु मुक बधिर है। इन पांच सदस्यीय परिवार को भोजन  पानी तक का अकाल है। गरीबी इस कदर है कि विगत 25 जुलाई को 10 वर्षीय बेटी नेहा की मौत के बाद उसका श्राद्घ करने के पैसे भी नहीं थे।

वीरेन्द्र सिंह

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