युग बदला, हम बदले या बदल गया जमाना... आज बहुत याद आया बचपन को 'वो' दिन


'आदरणीय पिताजी, माता जी, भैया-भाभी, चाचा-चाची सादर चरणस्पर्श... आशा करता हूं कि आप लोग कुशल पूर्वक से होंगे। सभी बड़ों को प्रणाम, छोटों को शुभाशीर्वाद।' यह वाक्य, शायद ही अब कही दिख रहा है। क्योंकि चिट्ठियों का जगह तो WhatsApp, Messenger और Video calls ने ले लिया है। आज रक्षा बंधन पर डाकखाना के साथ अचानक 'वो' बचपन याद आया। जब गांव में पोस्ट ऑफिस पर जाकर बैठ जाना होता था। डाकिया बोलते थे, ये लीजिए। देख लीजिए, इसमें आपके घर का हो तो निकाल लीजिए। अंतर्देशीय पत्र, पोस्टकार्ड को चेक कर अपनी चिट्ठी निकलती थी, जिसे खोलकर अंदर लिखा पढ़ते हुए घर तक आना होता था।

बाबुवा केकर चिट्ठी हअ, हंसकर बोलना कि भैया के चिट्ठी हअ माई

वो मिट्ठी बातें चिट्ठी पढ़कर सुनाना कि वहीं ऊपर में लिखीं बातें। फिर आगे क्या लिखा है, मतलब जिसका नाम उस पत्र में लिखा हो सुनने और पढ़ने में अच्छा लगता था। अब तो व्हाट्सअप,  मेल के आगे ये सब वाक्य ही लुप्त हो गए। इतना ही नही कहीं से कोई सन्देश आता है। वह मोबाइल स्वामी तक ही रह जाता है। समयाभाव के चलते अन्य सदस्य को सन्देश साझा नहीं हो सकता। 

जल्दी पत्र मिलने के लिए बैरंग पत्र

अंतर्देशीय पत्र, लिफाफा, पोस्टकार्ड जब जल्दी नही मिलता था तो परिवार की तरफ से बैरंग (सादा पन्ना पर लिखा) पत्र भेजना होता था। यदि कोई नही ले पाता था, वहीं से बैरंग पत्र वापस होता था। बैरंग का कुछ शुल्क जरूर लगता था। क्या वो भी जमाना रहा। 

रक्षाबंधन के महीनों पहले डाकिया राखी लेकर पहुंचते थे

भाई-बहन का प्रेम आज भी है, लेकिन वो नही जो पहले था। लिफाफा में राखी आती थी। दो शब्द भाई के लिए लिखा होता था। अब तो शायद औपचारिक रूप ही दिखाई दे रहा है। हां खर्च के मायने में अगर देखा जाय तो रक्षाबंधन पर्व बहुत कुछ है। लेकिन पहले-अब में जमीन आसमान का फर्क है। अंतर स्पष्ट कर पाना मुश्किल है। बुआ, बहने आकर गांवों में घूम कर राखी बांधती थीं। उतना ही नहीं, सम्मानित पंडीजी जी भी हाथों में सैकड़ों राखी धागा लेकर चलते थे, जो मिला उसी के हाथ में राखी। बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर देता है।

शब्दों के अनुसार लगता था पैसा,  तार का बढ़ा प्रचलन

 घर का कोई बाहर नौकरी करता था। छुट्टी नही मिलती थी या गांव आना सालों हो गया। या फिर बीमार कोई हो गया। परिवार में कोई अनहोनी हो गयी। ऐसे में तार घर जाकर तार छोड़ा जाता था। कम शब्द के लिए MOTHER SERIOUS  COME SOON जो भी मतलब उसके अनुरूप ही सब चला। अब तो कॉल करने पर ही अधिकतर समस्या का समाधान हो जा रहा है। नहीं हुआ तो औपचारिकता पूर्ण के लिए मेल पर लिखकर भेज दें। व्हाट्सअप कर दें।

अब तो जो चाह रही, वही प्रकृति भी दे रही

अपनो से दूर जाने की चाहत भी झलकने लगी है। भाई-भाई कान में बात कर सलाह लेते थे। अपने करीब हुआ करते थे। लिखना-पढ़ना भी बेकार ही लगता है। प्रकृति ने कोरोना के माध्यम से भय पैदा कर दिया कि दो गज की दूरी रखते हुए अपनो से बात करें। यानी समाजिक दूरी बनाने के लिए प्रचार-प्रसार भी जोरों पर चलने लगा। 

सरकारी या निजी संस्थानों में फैक्स ने भी जगह लिया

सरकारी हो या निजी संस्थान फैक्स भी बहुत महत्व रखा। लेकिन बदलते जमाना में यह भी नाम मात्र के लिए कहीं कार्यालयों में दिखता है। इस जगह पर भी वही दिख रहा है।

एक जमाना था जब दोस्त की चिट्ठी आती थी, मोबाइल के जमाना में वर्षों हो गए

दोस्ती से बढ़कर दुनियां में सभी सम्बन्ध फिंके पड़ जाते हैं। चिट्ठियां आतीं थी। पढ़ना भी होता था। अंग्रेजी में, हिंदी में पत्र लिखकर आता था। मित्र संजय सिंह हम एक साथ पढ़े। वो एयरफोर्स में भर्ती हुए। ट्रेनिंग के दौरान की चिट्ठी मिल गई। हालांकि वो सेवानिवृत्त भी होकर आ गए। अब 'पंजाब एंड सिंध बैंक' में प्रबंधक पद पर हाल ही में कार्यरत हुए हैं। वर्षों हो गए, मोबाइल पर भी बात नहीं हो पाती। कारण कि समयाभाव है। इसे ही एक अलग दूरी कही जाय तो कोई अतिशयोक्ति नही होगी।

कोरोना महामारी कहीं का नही रहने दिया

जो जहां है थम सा गया है। बनती जा रही दूरियां। यह नियत पहले नहीं बनती तो शायद कोरोना भी नहीं आता। लेकिन परिस्थियां जब दिखने लगती हैं। वहीं मन कई तरह से घूमने लगता है। हालात ऐसे हो गए कि कोरोना महामारी कहीं का रहने नही दिया।

याद है न जब नेवता आता था, उसके लिए कोई न कोई जाता था

वह भी दिन खत्म हो गए। जब किसी रिश्तेदारी में उत्सव होता था। नेवता आता था। उसमें कोई न कोई परिवार का उपस्थिति दर्ज कराते हुए नगद धनराशि देते हुए। दर्ज कराता था। सम्बन्धी कोई बैठकर डायरी पर लिखता था। धीरे-धीरे सब समाप्ति के कगार पर आ गया है। 


नरेन्द्र मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार बलिया

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