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गंगा और घाघरा के डेंजर पॉइंट पर फोटो खिंचवाने का सुनहरा अवसर Ballia News

शशिकांत ओझा

बलिया। गंगा और घाघरा से घिरे इस जनपद में प्रत्येक वर्ष बाढ़ व आग से व्यापक तबाही,  जान-माल की क्षति होती है। ऐसे में जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों का इन स्थानों पर आना जाना लगा रहता है।  लेकिन विडंबना है कि पिछले कुछ वर्षों से बाढ़ कटान स्थल का निरीक्षण एक महोत्सव की तरह हो गया है। कटान पीड़ितों को कहीं कोई राहत मिलती तो नहीं दिखती,  अलबत्ता नेताओं और अधिकारियों के कटान स्थल पर फोटो सेशन को देख उनका दुख बढ़ जाता है।  हालांकि यह प्रथा पिछले कुछ वर्षों से ही अस्तित्व में आई है। पहले जब कोई बड़ा जनप्रतिनिधि या अधिकारी बाढ़ और कटान के निरीक्षण को निकलता था तो  जिला स्तरीय अधिकारियों और  स्थानीय प्रशासन के हाथ-पांव फूल जाते थे। परंतु अब परिस्थितियां पूरी तरह इतर हैं। 

कटान स्थल का निरीक्षण मुख्यमंत्री करें,  मुख्य सचिव करें,  प्रमुख सचिव करें,  मंडलायुक्त करें या सांसद और विधायक। अधिकारी अपनी ही गति से काम को अंजाम देते रहते हैं। कारण कि उन्हें पता है कि इस निरीक्षण से कुछ होना जाना नहीं है। सिर्फ कोरम पूरा किया जाना है। सत्ता पक्ष के लोग यदि निरीक्षण को जाते हैं तो वह दिखावा के लिए अधिकारियों की क्लास लगाते हैं और पीड़ितों को आश्वासन देते हैं। जबकि विपक्ष का कोई नेता इन स्थलों पर जाता है तो वह सरकार और विभाग की कमियां गिनाता है। पीड़ितों को आश्वासन देता है कि वह उनके साथ है। सोचनीय विषय यह है कि बाढ़ पीड़ितों को सत्ता और विपक्ष दोनों से सिर्फ आश्वासन ही मिलता है। 

बात बलिया जनपद की करें तो एनएच 31,  टीएस बंधा सहित अन्य बांधों को बचाने के लिए पिछले पांच दशक में अरबों रुपए खर्च किए जा चुके हैं।  परंतु परिस्थितियां आज भी जस की तस बनी हुई हैं। हर वर्ष बांध और गांवों को बचाने की कवायद होती है।  धन खर्च होता है। फिर भी परिणाम बांध का टूटना और गांवों का गंगा और घाघरा में विलीन होने के रुप में प्राप्त होता है। ऐसे में आवश्यकता इस बात की है की बाढ़ पीड़ितों को राहत धरातल पर उपलब्ध कराई जाए,  बांधों को बचाने के लिए जमीनी स्तर पर काम किया जाए और  निरीक्षण महोत्सव के नाम पर बाढ़ पीड़ितों के सीने पर मूंग दलने का काम बंद हो।

शशिकांत ओझा
वरिष्ठ पत्रकार, बलिया की फेसबुकवाल से

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