असंतुलित होते पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी तंत्र के भुगतने पड़ेंगे घातक परिणाम


मानव द्वारा विकास के क्रम में एवं भोगवादी प्रवृत्ति तथा विलासितापूर्ण जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु कभी आवश्यकतावश, कभी अज्ञानतावश तो कभी जानबुझकर संसाधनों की प्राप्ति हेतु पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी के तत्वों का अतिशय दोहन एवं शोषण किया जाता रहा है, जिसके चलते अधिकांश संसाधन समाप्ति के कगार पर पहुंच चुके हैं एवं कुछ तो सदैव के लिए समाप्त हो गये हैं। वनवृक्षों की समाप्ति से अनेक तरह की पादप प्रजातियां एवं जंगलो में निवास करने वाले जीव-जंतुओं की अनेक प्रजातियां समाप्त हो गयी हैं। अधिकांश समाप्ति के कगार पर हैं। इस तरह सम्पूर्ण जैव विविधता ही नष्ट होती जा रही है।


                     डॉ. गणेश पाठक

बलिया। पर्यावरणविद् डॉ. गणेश पाठक कहते है कि एक तरफ जहां प्राकृतिक संसाधनों के समाप्त होने से पारिस्थितिकी तंत्र में असंतुलन बढ़ रहा है, जिससे अनेक तरह की प्राकृतिक आपदाएं हमारा अस्तित्व मिटाने पर तुली हुई हैं। वहीं दूसरी तरफ औद्योगिकीकरण, नगरीकरण एवं मानव की गतिविधियों के चलते पर्यावरण प्रदूषण में भी तेजी से वृद्धि हुई है, जिससे जल, वायु, ध्वनि, मिट्टी, वायुमंडल आदि सब कुछ प्रदूषित होकर मानव को संकट में डाल दिया है। या यों कहें कि हमारी गतिविधियाँ ही हमारे विनाश का कारण बन रहीं है। 

दूसरी तरफ बढ़ते ग्लोबल वार्मिंग के परिणामस्वरूप हो रहे जलवायु परिवर्तन से तापमान में तेजी से वृद्धि हो रही है, जिसके चलते मृदाक्षरण, भूस्खलन, सूखा, चक्रवात, अति वृष्टि एवं अनावृष्टि जैसी घटनाओं में वृद्धि हो रही है। प्राकृतिक आपदाएं हमारा विनाश करने को तत्पर हैं।जलवायु परिवर्तन के कारण जीवधारियों एवं वनस्पतियों के लिए भी खतरा बढ़ता जा रहा है। पादप एवं जीव जातियाँ समाप्त होती जा रही हैं। ग्लोबल वार्मिंग से फसल चक्र भी प्रभावित हो रहा है एवं कृषि उत्पादकता घटती जा रही है, जिससे भविष्य में खाद्यान्न संकट की भी समस्या उत्पन्न हो सकती है।

                डॉ. सुनील गुप्ता, HM

बलिया सहित पूर्वांचल का पर्यावरण भी है बेहद असंतुलित

यदि हम क्षेत्रीय स्तर पर बलिया सहित पूर्वांचल के जिलों में पर्यावरण की स्थिति का अवलोकन करें तो स्थिति बेहत असंतुलित दिखाई देती है। वैसे भी पूर्वांचल में प्राकृतिक संसाधनों की कमी  है। किन्तु जो है वह समाप्त हो चुकी है या समाप्ति के कगार पर है। पूर्वांचल सिर्फ वन, मिट्टी एवं जल संसाधन पर निर्भर रहा है। वन क्षेत्र की स्थिति यह है कि आजमगढ़, मऊ, बलिया, जौनपुर, गाजीपुर, चंदौली, वाराणसी, संतरविदासनगर, मिर्जापुर एवं सोनभद्र जिलों में यहां की कुल भूमि के क्रमशः 0.03, 0.33, 0.01, 0.02, 0.04, 30.0, 0.00, 0.16, 24.140 एवं 47.84 प्रतिशत भूमि पर ही वन क्षेत्र हैं, जबि पारिस्थितिकी संतुलन हेतु कुल भूमि के 33 प्रतिशत भूमि पर वन क्षेत्र आवश्यक होता है।

इस तरह पूर्वांचल में स्थिति विकट है। इस क्षेत्र की मिट्टी यद्यपि कि उपजाऊ थी, किन्तु आधुनिक कृषि ने उसे भी चौपट कर दिया है और मिटृटी की उर्वरता दिन प्रतिदिन कम होती जा रही है तथा उत्पादकता घटती जा रही है। जल संसाधन का आलम यह है कि धरातलीय जल नदियाँ एवं ताल- तलैया सूखते जा रहे हैं। ताल-तलैयों पर अनाधिकृत कब्जे होते जा रहे हैं, जबकि भूमिगत जल का भी इतना निष्कासन हुआ है कि जल तल काफी नीचे खिसकता जा रहा है जिससे बलिया के पश्चिमी क्षेत्र के कई विकासखण्ड ब्लैक जोन में आने के कगार पर हैं।ऐसी स्थिति में बलिया सहित पूरे पूर्वांचल का भविष्य पर्यावरणीय दृष्टि से अच्छा नहीं कहा जा सकता।

आखिर कैसे बचाया जाय पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी के असंतुलन को

अब प्रश्न यह है कि आखिर पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी को कैसे बचाया जाय? इस संदर्भ में इतना तो निश्चित कहा जा सकता है कि इसका एक मात्र उपाय वनावरण को बढ़ाना है। वन ही एक ऐसा पर्यावरण का अवयव है कि अगर वह संतुलित रहे तो उसके सहारे अधिकांश तत्व अपना विकास पर पुष्पित- पल्वित होते रहते हैं और पारिस्थितिकी तंत्र संतुलित रहता है। किन्तु बलिया सहित पूर्वांचल के 7 जिलों आजमगढ़, मऊ, बलिया, गाजीपुर, जौनपुर, वाराणसी एवं संतरविदासनगर में एक प्रतिशत से भी कम वनावरण है। कृषि प्रधान इस क्षेत्र में अब प्राकृतिक रूप से वनावरण का विस्तार करना असम्भव ही लगता है, किन्तु मानव द्वारा रोपित वृक्षों का विस्तार कर इस कमी की पूर्ति कर पर्यावरण के असंतुलन को रोका जा सकता है। सरकार द्वारा काफी प्रयास भी किए जाते हैं, किन्तु उसमें कितनी सफलता मिलती है, सब लोग जानते हैं। केवल सरकार के भरोसे वृक्षारोपण के लक्ष्य को नहीं पाया जा सकता है, बल्कि इसमें जन-जन को अपनी सहभागिता निभानी होगी। इसे जनान्दोलन के रूप में करना होगा। प्रत्येक उत्सव, त्यौहार, पर्व, जन्मदिन, शादी-विवाह या किसी भी शुभ अवसर पर वृक्षारोपण का अनिवार्य रूप से मुहिम चलानी होगी और पुनः अपनी अरण्य संस्कृति को जीवन का अंग बनाना होगा। कृषि में आधुनिक एवं परम्परागत दोनों विधियों का समन्वय स्थापित कर एवं रासायनिक खादों का कमसे कम प्रयोग कर जैविक खाद पर आधारित खेती कर मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखा जा सकता है। जल संरक्षण के लिए हमें भगीरथ प्रयास करना होगा। जल का समुचित उपयोग करना होगा। भूमिगत एवं धरातलीय दोनों जल को प्रदूषण से बचाते हुए कम उपभोग की प्रवृत्ति को बढ़वा देना होगा। इन सबके लिए जनसहभागिता एवं जनजागरूकता आवश्यक है।

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