लहरों को मात देकर खड़ा बलिया का यह मंदिर किसी चमत्कार से कम नहीं


ऋषि-मुनियों की तपोभूमि भृगु नगरी का इतिहास काफी प्राचीन है। परन्तु विडम्बना यह है कि दो नदियों के बीच का अस्तित्व होने की वजह से बहुत से ऐसे ऐतिहासिक निशान है, जो कालान्तर में गंगा और सरयू के तेज धार में विलीन हो गए।इन नदियों के बेरहम लहरों का जो सामना कर अडिग खड़े रहे वो अब रख-रखाव के अभाव में या तो विलुप्त हो गए या फिर विलुप्तता की कगार पर है। आइये, हम आपको ऐसे ऐतिहासिक मन्दिर का दर्शन करवाते है, जिसका आस्तित्व एक दो नहीं, बल्कि साढ़े चार शतक पुराना है। गंगा नदी के लहरों को मात देकर अडिग खड़ा ये मंदिर किसी चमत्कार से कम नहीं...


उत्तर प्रदेश के बलिया जनपद मुख्यालय से महज चौबीस-पच्चीस किलोमीटर पूरब स्थित मझौवा ढाले से दक्षिण दिशा में स्थापित मझौवा ठाकुरबाड़ी (मन्दिर) का इतिहास लगभग साढ़े चार सौ साल प्राचीन रहा है। जनचर्चा के अनुसार इस ठाकुरबाड़ी का निर्माण केसठ (वर्तमान में बक्सर, बिहार) की रानी ने अपने पूजा-पाठ की नीयत से करवाया था। कालांतर में इस भाग पर हल्दी नरेश का अधिकार हो गया। कहते है कि इस मंदिर और मन्दिर से जुड़ी सम्पति को हल्दी नरेश ने अपने कुलुपरोहित मख़सूदन दुबे को दान में दे दिया था। इसका प्रमाण इससे भी मिलता है, क्योंकि इसी मंदिर के समीप ही मख़सूदन दुबे के पुत्र श्री यश बाबा का स्मारक स्थल भी है। 



कहते है श्री मख़सूदन दुबे की दो सन्तान एक पुत्री किशोरी व एक पुत्र यश दुबे थे। पुत्री किशोरी का विवाह देवरिया के नागनाथ तिवारी संग कर दिया था। कहते है जब यश दुबे का जन्म हुआ, तब किसी काशी के पंडित ने यह भविष्यवाणी की थी कि जिस दिन इस बालक का यज्ञोपवीत संस्कार होगा, उसके अगले दिन इस बालक की मृत्यु हो जाएगी। सन्तान के मृत्यु की भविष्यवाणी से घबराए मख़सूदन दुबे ने पुत्र का यज्ञोपवित संस्कार करने का विचार ही मन से निकाल दिये।



यह बात जब हल्दी नरेश को पता चली तो उन्होंने उनके पुत्र का पूर्ण सुरक्षा का वचन दिया। कहते है कि यश दुबे का यज्ञोपवीत संस्कार के अगले ही दिन सर्प दंश से मृत्यु हो गया। इसी मन्दिर परिसर के समीप ही यश बाबा का स्मारक स्थल होना, इसका जीवंत प्रमाण है। यश बाबा का एक मुख्य स्मारक ग्राम अगरौली स्थित भी है। यश दुबे की ब्रह्मलीन होने के उपरांत सम्पति की देखरेख की सम्पूर्ण जिम्मेदारी तब पुत्री किशोरी के पति नागनाथ तिवारी के कंधों पर आ गई और वे सपरिवार यही के होकर रह गए।



कालांतर में इस मन्दिर के प्रथम महंत श्री रामरटन दास कंठीधारी हुए। ततपश्चात रामप्रसाद, शालिग्राम आचार्य इत्यादि महंथ हुए। श्री शालिग्राम की विद्वता दूर-दूर तक फैली हुई थी।उनकी विद्वता से प्रभावित होकर बिहार के सीतामढ़ी जिला स्थित सुरसंड के राजा ने केसठ की रानी द्वारा निर्मित ठाकुरबाड़ी के समीप ही एक मंदिर का निर्माण करवा दिया था। आगे चलकर इस मंदिर के महंथ श्रेणी में अनेक महंथ जैसे रामगिविंदाचार्य, लक्ष्मीनिवास व श्रीकांताचार्य हुए।महंथगिरी के इस कड़ी में एक समय ऐसा भी आया, जब परिवार में भाई-भतीजावाद का विवाद हो गया। मन्दिर सम्पति का बहुत सा हिस्सा इसके कानूनी लड़ाई में खुर्द-बुर्द हो गया। 



अंततः कानूनी रूप से तब नारायनाचार्य महंथ पद पर आसीन हुए। नारायणाचार्य के बाद 24 नवम्बर सन 1952 से अब तक महंथ के रूप में श्री मख़सूदनाचार्य कार्य देखते है। कहते है कभी इस मंदिर से जुड़ी सम्पति नेपाल, सुरसंड और बिहार तक थी, जो अब केवल कुछ ग्रामसभा तक ही सिमटकर रह गया है। जहां मन्दिर से जुड़ा इतिहास इतना प्राचीन रहा है, वही ये मंदिर काफी समय तक लावारिशों की तरह अपने हालात पर आंसू बहाता रहा। अपने आगोश में लगभग साढ़े चार सौ साल का इतिहास समेटे मन्दिर परिसर में कई साल तक दीपक जलना तो दूर कभी सफाई तक नही हुई। लेकिन सुखद पहलू यह है कि मझौवा गांव के ही कुछ जागरूक युवाओं की पहल पर इस मंदिर को इसके असली रूप में लाने का प्रयास किया जा रहा है। मन्दिर शैने-शैने अपने आस्तित्व की तरफ लौटने लगा है।

बलिया से रवीन्द्र तिवारी की खास रिपोर्ट

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