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‘ढ़िबरी’ की रौशनी में बसंती बहार, परम्परा को ‘जिन्दा’ करने जुटा गांव-जवार

बैरिया, बलिया। विलुप्त हो रही परम्परा का जीवन्त रुप धरातल पर बुधवार को तब दिखा, जब ढिबरी फाउन्डेशन ने गऊंझी फगुआ एवं होली गीत के लिए बैरिया जीप स्टैड में एक नया मंच दिया। परम्परा के लोप होने से चाहकर भी एक युवक भाग नही ले सके, क्योंकि परम्परागत फगुआ गायन उनके बुते की बाहर की बात थी। वही कई गांव के बुजुर्ग गोल बना कर मर्मिक प्रस्तुति किये। ऐसा लग रहा था कि ब्रज की होली बैरिया में हो रही है। कार्यक्रम में गड़ेरिया, मुरारपट्टी, नरदरा, जगदीशपुर, टेगंरही, बैरिया, मिश्र के मठिया, टोला फकरू राय, कर्ण छपरा, इब्राहिमाबाद के बुजुर्गो ने अपने प्रस्तुति से बसन्त का स्वागत किया। सभी टीमो को सहतवार के व्यास भरत गुप्ता व सेरिया के व्यास सत्यनरायण ने स्वागत किया।टीम ने अपनी प्रस्तुति के दौरान ‘शिव पार्वती खेले फाग आहो लाला शिव पार्वती खेले फाग……।’, ‘नाचत बैल बजावत डमरू, बाजत ताल मृदंग सहनाई खेलत खूब हरसाई, ब्रज मे हरि होरी मचाई।’, ‘बंगला में उड़ेला अबीर हो लाला, बगंला मे उड़ेला अबीर।’,
‘गिरजा पूजनवा के जासू आहो लाला गिरजा पूजनवा के जासू, राजा जनक के परम सुन्दरी।’, ‘इतते निकसी नवल राधिका उतते कुअंर कन्हाई, खेलत फाग परस्पर हिल मिल शोभा बरनी न जाई।’ आदि प्रस्तुति ने होली गीत के माध्यम से भक्ति का एहसास कराया।ऐसा लग रहा था मानो कई वर्षो बाद एक पुरानी परम्परा धरा पर उतर कर फगुआ को जीवन्त कर रही है। संचालन प्रो. सुभाष चन्द्र सिंह ने किया। मौके पर सुरेन्द्र सिंह व्यास, रामदेव सिंह, अमित मिश्रा, अजंनी उपाध्याय, पिंकू सिंह, राघवेन्द्र सिंह, राजू सिंह, संस्कार सिंह विक्की, गुप्तेस्वर पाठक आदि मौजूद रहे। ढिबरी फाउन्डेशन की ओर से पिंकू सिंह ने सभी आगन्तुकों का आभार प्रकट किया।

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