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‘जज़्बातों का खून हुआ है, कैसी आयी होली है…’ शिक्षा मित्रों का दर्द बयां करती कविता वायरल

छटपटाहट

अरमानों का गला दबा है, छोड़ चला हमजोली है।
जज़्बातों का खून हुआ है, कैसी आयी होली है।

बिंदी छूटी चूड़ी टूटी, रूठी पैर महावर है।
फूट-फूट के बच्चे रोते,दर-दर खानी ठोकर है।
किस गुनाह की सजा मिली है,कोई कुछ तो बतलाये।
पढ़ना लिखना इन बच्चों का,कैसे होगा समझाये।

घर के आँगन सजती थी जो, रोती आज रँगोली है।
जज़्बातों का खून हुआ है,कैसी आयी होली है।

खूब पढ़ेगा बेटा मेरा, खूब पढ़ेगी ये मुनियां।
शिक्षा मित्रों के भी सपने, घर आँगन होंगी खुशियां।
सबके सब उपहास उड़ाते,दंश ज़हर का झेला है।
राजनीति का खेल घिनौना, सबने मिलकर खेला है।

देख रही टकटकी लगाये , शिक्षा मित्रों की टोली है।
जज़्बातों का खून हुआ है,कैसी आयी होली है।

बड़ी-बड़ी-सी तस्वीरें हैं,चौराहों पर मुस्कातीं।
बेबस मज़लूम गऱीबों का, मानो उपहास उड़ातीं।
कागज़ की कालाबाजारी,फाइल रोती घड़ी-घड़ी।
उद्घाटन सम्मेलन उत्सव,होतीं बातें बड़ी-बड़ी।

जेड सुरक्षा सब सुख साधन, मेरी खाली झोली है।
जज़्बातों का खून हुआ है ,कैसी आयी होली है।

रोजी रोटी ही तो माँगी,मौत चली क्यों आती है।
और नहीं बस !अब और नहीं, पीड़ा झेली जाती है।
फिर कब क्या हो जाए, चुप ही रहना चर्चित है।
सब्र-बाँध जो टूट गया तो,परिचित परलय निश्चित है।

एक स्वयंभू वही जगत में,आह हृदय से बोली है।
जज्बातों का खून हुआ है ,कैसी आयी होली है।

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