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आओ एक ऐसी सुबह बुनें, जिसमें…

बलिया। अयोध्या मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को देश के बहुभाषी-बहुधर्मी समाज ने जिस तरह ग्रहण किया, यकीनन वह परिपक्वता का परिचायक है। अपने भावी इतिहास को लेकर फिक्रमंद लोगों ने फैसले का स्वागत कर संवैधानिक संस्थाओं के प्रति जो आदर व सम्मान प्रकट किया है, वह भी काबिल-ए-तारीफ है। बेशक, अयोध्या विवाद कानून की नजर में जमीन के एक टुकड़े पर मालिकाना हक को लेकर था, पर अदालत के बाहर इस मुद्दे को धर्म, आस्था व कट्टरता के आधार पर तौला गया।

इसी आधार पर लड़ाई लड़ी गई। राजनीति के माहिर खिलाड़ियों ने एक धर्म को दूसरे धर्म के खिलाफ खड़ा कर दिया। धर्म सबको साथ लेकर चलने की हिमायत करता है। धर्म में किसी भी तरह की कट्टरता, दुश्मनी, साजिश व झूठ का कोई स्थान नहीं है।

बहरहाल देश की सर्वोच्च अदालत ने दोनों धर्मों की आस्था का मान रखा और ऐतिहासिक निर्णय सुना दिया। इसका हर कोई मुक्त कंठ से प्रशंसा कर रहा है। हां, इस फैसले का दूसरा पक्ष ज्यादे समीचीन व स्पष्ट है। फैसले के बाद न सिर्फ सरजू किनारे के अपितु घट-घट व्यापी राम व रहीम दोनों मुस्कुरा रहे हैं। हसें भी क्यों न, उनकी चादर ने मंदिर व मस्जिद दोनों को पनाह जो दे दी है। कैसी विडंबना है कि जिसे हम दो स्थान मानकर अलग-अलग कर रखे थे, उन दोनों को राम की अयोध्या ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। अलबत्ता सरयू भी यही कह रही होगी कि अब बहुत हुआ। बहुत घर बने और बर्बाद हुए। बहुत सी चीजें टूटी, बनी और बदली भी, पर अब तुम लोग अपनी फिक्र करो। हमसे ज्यादे खुद की चिंता करने वालों तेरी हर मुराद पूरी हो गई। तुममे से हर एक को राम-रहीम ने अपने दिल में जगह दी है। अब इनकी ख्वाहिश है कि तुम अपनी फिक्र करो। अपने बच्चों को शिक्षा, स्वास्थ्य और तरक्की के रास्ते पर ले अाओ। मसला खत्म हुआ। अब नए सूरज में ऐसी सुबह बुनों, जिसमें नफरत का कोई स्थान न हो। अयोध्या ने मंदिर-मस्जिद दोनों को स्वीकार कर लिया है, बात खत्म। अब देश को आगे बढ़ाने में योगदान करो। आपस में प्रेम करों। एक दूसरे का सम्मान करों, क्योंकि सरयू ने बता दिया है कि उसका पानी आचमन के लिए जितना पवित्र है, उतना ही वज़ू के लिए भी। सरयू के सन्देश को समझों और अब अपने भविष्य को सजाने संवारने में जुट जाओ। रोज़गार और तरक्की की फिक्र करो। राम हम सबके साथ थे, हैं और रहेंगे। अयोध्या सबकी है, क्योंकि राम सबके हैं। इसलिए अब अपनी और मुल्क की तरक्की में लगो, यही अंतिम सत्य है।

अजीत पाठक, वरिष्ठ पत्रकार

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