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किसको सुनाएं हाल दिल-ए-बेकरार का…

पिछले दिनों, यानि अगस्त में सोशल मीडिया पर एक तस्वीर खूब वायरल हुई थी। वह थी पतंजलि के सीइओ व बाबा रामदेव के करीबी आचार्य बालकृष्ण की। दुनिया भर को योग से निरोग होने का मंत्र देने वाले आचार्य के हार्ट अटैक की खबर लोगों ने ट्रोल किया था। संवेदना कम, मजाक ज्यादा बनाया गया।

अब दिल्ली, वकीलों और पुलिसकर्मियों का विवाद सोशल मीडिया का ताजा मसाला है। कहा जा रहा है कि दिल्ली के लोग ऑक्सीजन मांग रहे, पुलिस सुरक्षा मांग रही और वकील न्याय मांग रहे। हालांकि दिल्ली सहित देश के कई बड़े शहरों में प्रदूषण का खतरा दिवाली से पहले ही सुर्खियों रहा। इस बीच वकील और पुलिस का विवाद सामने आ गया।

हफ्तेभर से देश का सोशल साइट्स यूजर कथित प्रबुद्ध तबका जाग गया है। कुछ वकीलों के पक्ष में, तो कुछ पुलिस के। कई तो बीच का रास्ता भी सुझाने लगे हैं। वहीं, कुछ की पीड़ा सबसे अलहदा है। एक बड़े भाजपा नेता के छोटे भाई दिल्ली में वकील है, तो साला दिल्ली पुलिस में डीसीपी। बिचारे असमंजस में है, किधर जायें। आम आदमी भी परेशान। किसके पक्ष की बात करें। एक को मनाऊं तो दूजा रूठ जाता है।

कई सालों के सामाजिक और पत्रकारीय जीवन में मेरा भी पाला पुलिस और वकीलों से पड़ा है। कइयों से तो आत्मीय संबंध है। बहुत करीब से जानता भी हूं और भी तमाम नौकरी-पेशा वाले लोग हैं। जहां तक मेरी समझ है अथवा मेरी सोच का अंतिम छोर है, मुझे लगता है कि दोनों के बीच के कुछ लोगों के व्यक्तिगत इगो की परिणति पूरी घटना है।

90 के दशक में दूरदर्शन पर एक विज्ञापन आता था। बस में कुछ लोग सवार होते हैं। उनके चेहरे इंसान के होते हैं और कुछ देर में ही धीरे-धीरे बदलकर शैतान की शक्ल हो जाती है। तभी बैकग्राउंड से आवाज गूंजता है-शैतान बनना आसान है, लेकिन क्या इंसान बने रहना इतना मुश्किल?

दरअसल… पुलिस और वकील ही नहीं, किसान, पत्रकार, छात्र, व्यापारी, नेता या कुछ और। ये सब किसी व्यक्ति का बाहरी आवरण होता है। हर समय उसके अंदर एक दूसरा किरदार भी उछलता रहता है। वह संवेदनशील भी हो सकता है, संवेदनहीन भी। भावुक हो सकता है, तो क्रूर भी। हर समय तनाव वाली जिंदगी भी इसके पीछे बड़ी वजह है। बस, कब ज्वालामुखी फुटेगी, किसी को नहीं पता।

पक्ष-विपक्ष और सही-गलत के तर्क-कुतर्क के बीच इस बात को झुठला नहीं सकते कि दोनों ही सिस्टम का हिस्सा है और दोनों का ही किरदार अहम है। आम आदमी की उम्मीदें भी एक से टूटती है, तो दूसरी पर जाकर टिक जाती है। ऐसे में यह टकराव न केवल मुश्किल हालात पैदा कर रहा, बल्कि बेचैनी भी बढ़ा रहा है। गलत जो भी हो, उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिये। लेकिन, यूं दो भरोसेमंद स्तंभ को हवा के तरंगों संग नीलाम करना उचित नहीं।

धनंजय पांडेय, वरिष्ठ पत्रकार

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