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छठ आते ही बलिया के इस पत्रकार को याद आया बचपन का पुआ

#छठ वाला पुआ…

बिहार-यूपी का महान पर्व छठ अगले हफ्ते हैं। घर से लेकर बाजार तक चहल-पहल दिख रही। हर तरफ तैयारी जोरों पर हैं. परंपरा, संस्कृति और आस्था के संगम में डुबकी लगाने को परदेस ही नहीं, विदेश से भी लोग घर लौट रहे। सबसे खास, महिलाओं के कठिन तप-व्रत होता हैं। घर-परिवार और बच्चों की खुशहाली और समृद्धि के लिए उपवास करती है, विधिवत पूजन-अर्चन करती है।

खैर… महिलाओं के तीन-चार दिन के तप की चर्चा तो हर तरफ होती है, लेकिन एक और वर्ग है जो कुछ घंटों ही सही कठिन दौर से गुजरता है। जी हां, वह होते हैं घर-परिवार के बच्चे (पिज्जा कल्चर वाले नहीं)। पहले अर्घ्य के दिन, यानि डूबते सूर्य को अर्घ्य देने वाले दिन, जब सुबह से घर में तैयारी चलती है, तब बच्चों पर क्या बीतती है, कोई नहीं जानता। पुआ-पकवान, तरह-तरह के फलों से सजी टोकरी, और भी न जाने क्या-कया… बस, कब सुबह हो, इसका ही इंतजार रहता है।

मुझे तो हर साल अपना बचपन याद आ जाता है। यही कोई पांच-छह साल का रहा होगा, तब पुआ के लिए ब्रह्मांड को सिर पर उठा लिया था। घर से छठ घाट तक जाने में सबको पसीना छूट गया मुझे मनाने में। बलिया के छोटे से गांव बसुधरपाह में मेरे जनम से पहले से ही छठ की पूजा धूमधाम से होती है। आज भी वही नजारा होता है, लेकिन व्यस्तता का असर पड़ा है। पहले घाट की तैयारी दो-दिन पहले होती थी, अब उसी दिन होती है।

80 के दशक में, जब मैं बच्चा था। छठ के दिन सुबह से ही घर में तैयारी देखकर मन बेचैन था। दोपहर में पुआ-पकवान बनने लगा, तो बेचैनी बढ़ने लगी। आखिरकार वह वक्त भी आ गया, जब बड़े भइया लोग सिर पर दउरा लेकर गांव के बाहर बने घाट की ओर चल दिये। पश्चिम में सूरज की रोशनी धीरे-धीरे कम हो रही है और धरती में मेरी बेचैनी लगातार बढ़ रही थी।

मेरी मां, बड़ी मां और बहनों के साथ आस-पास की महिलाएं गीत गाते चल रही थी, तभी मेरी जिद शुरू हुई। हम एगो पुआ लेबि… यह सुनते ही सब अवाक। मुझे मनाने की जिम्मेदारी मिली बगल की एक फुआ को। उन्होंने कहा-घरे चलके दुगो पुआ ले लीह… फिर हमने कहा- हम दुगो पुआ लेबि… इस तरह वह प्रलोभन बढ़ाती गयीं, और मेरी डिमांड बढ़ती गयी। छठ के साथ मेरे घर में आज भी यह वाकया याद किया जाता है।

खैर… बात पिज्जा कल्चर के बच्चों के लिए नहीं है। लेकिन इतना तो हैं कि छठ के दिन बच्चे किस तरह मन मारकर रात गुजारते हैं, इस पर कोई ध्यान नहीं देता। कहावत है, जाके पांव ना फटे बेवाई, उ का जाने पीर पराई। मुझ पर बीत चुका है, सो याद आ गया।

जय छठ मइया…

धनंजय पांडेय वरिष्ठ पत्रकार ‘प्रभात खबर’ की फेसबुक वाल से

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