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मेरे उजड़े गांव में अब भी राम बसते हैं…

मेरे उजड़े गांव में अब भी राम बसते हैं

बूझ मेरा क्या नाव रे

नदी किनारे गांव रे, पीपल झूमे मोरे आंगना ठंडी ठंडी-छांव रे

बहुत दिनों की बात है जब मेरे गांव की युवतियां अलढपन में यूँ पहेलियाँ पूछा करती थीं पर अब न वो नदी रही, न वो पीपल का पेड़, न वो आँगन और नाही वो गाँव। बस, बचा है तो एक सड़क जिसके किनारे बैठ हम नदी के धार को निहारते रहते है, सवाल करते हैं – कहां है हमारे खेत – खलिहान और वो आम के बगीचे जिसकी छाँव में हम जवां हुये, कबड्डी के वो मैदान जहां यारों संग गलबहियां हुआ करते थे, वो पीपल के पेड़ तले चबूतरे पर पली बढ़ी हमारी किस्से – कहानियां ? अब कुछ भी तो नहीं है, बस यादों के सिवाय ?

दिल्ली के लुटियन राजपथ से जब अपने गांव को देखता हूँ तो दीखता है-सुदूर, उत्तर प्रदेश के पूर्वी इलाके के आखिरी छोर का एक बीमार शहर बलिया जो अपने गौरव गाथा के सहारे ढिठाई से सीना ताने खड़ा है और उसी के पीछे गांवो के जलमग्न हुये कुनबे के लोग से भरा अपना गांव रामगढ (कटान के बाद सम्मिलित नाम ) अपनी जीवटता लिये अपने वजूद का सबूत दे रहा है।

इतने पर भी हम थके नहीं, हारे नहीं, इसलिए कि हम बलि के वंशज हैं, वीर लोरिक के ताबेदार हैं, भृगु पंथी हैं या फिर मंगल जैसे सरफरोस हैं। तभी तो आज हम राम है, एक पुरुषोत्तम हैं, एक परम्परा के वाहक है, शक्ति के पूजक हैं। हमने अपने अवसादों को पीछे छोड़ दुर्गा की स्थापना की है। रामचरित्र को याद किया है। रावण दहन की तैयारी की है।यही तो है हमारी जीवटता, यही है हमारी परम्परा और यही है हमारे गांव और हमारी गाथा। मेरे गांव में राम अब भी बसते हैं।

भरत चतुर्वेदी पत्रकार की फेसबुक वाल से

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