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‘ए काका हथिया चढ़ि गईल बीया, लवना-लकड़ी धइ ले बे के बा’

‘ए काका हथिया चढ़ि गईल बीया, लवना- लकड़ी धई ले बे के बा’। ये बातें वर्षों पहले ग्रामीण इलाकों में सुनने को मिलती थी। हालांकि भारत गांवों का ही देश कहा जाता है और गांवों से लोग शहर में आये हैं। यही वर्षात है, जब उन दिनों गैस का चूल्हा घर में नही रहता था। झोपड़ी, कच्चे मकान ही हुआ करते थे। अब तो कच्चे मकान कहीं- कहीं ही दिख रहे हैं। वह भी लगातार बारिश से कई गांवों में धरासाई हो रहे हैं। जन जीवन अस्त व्यस्त हुआ है। जी हम बता रहे थे पहले की बात। कहीं झोपड़ी में सुखी लकड़ी या लकड़ी का कोयला जलाकर भुट्टा ( मक्का, भोजपुरी में बालि ) भूनकर खाना या घोंसार कहा जाता था, वहां से मक्का भूनकर आता था, यानि वो समय ही अलग रहा।

शाम होते ही किसी के घर धूआं निकलते ही

शाम होते ही किसी के घर धूआं निकलते ही पता चल जाता था कि फलां के घर आग जलाया गया है। आग पूरी तरह से पकड़ भी नही पाती थी, तब तक घर के छोटे बच्चे को आग लाने के लिए भेज दिया जाता था। कोई भी बर्तन हो, आग लाने लायक मिल जाता था और उसी चिनगारी से कइयों के घर चूल्हा जलता था। वो दिन भी याद आते हैं। माचिस एक डब्बा मात्र 25 पैसे का ही आता था, फिर भी समयानुकूल नही होता था।

ऐसे मौसम में अधिकतर लिट्टी-चोखा

लिट्टी चोखा का दौर तो आज भी है। लेकिन ऐसे मौसम के लिए हर घर में गोंयठा ( गाय- भैंस के गोबर को जलावन रूपी ) सम्भाल कर रखा जाता था। उसी से लिट्टी बनती थी। उसी आग में चोखा का सामग्री भी जैसे आलू, बैंगन, टमाटर डाल कर पकाया जाता था। और लिट्टी चोखा आसानी से बनते ही एक साथ बैठकर भोजन करते थे। अब तो लिट्टी चोखा का अलग रूप दे दिया गया है। इतना उतार चढ़ाव के बीच इधर छह दिनों से हो रही अनवरत बारिश और हथिया नक्षत्र की युगलवंदी ने पुरानी यादें ताजा कर दी है। गांव में बूढ़े-बुर्जुग अपने नाती-पोतों से अपनी पुरानी यादों को साझा कर मौसम की जानकारी देते नजर आ रहे है। कुछ तो घाघ की कहावतों को भी अपनी नवीन पीढ़ी को बता रहे है। कुछ जगह तो इस हथिया नक्षत्र ने कागज की कश्ती की भी याद दिला दी है।

नरेन्द्र मिश्र वरिष्ठ पत्रकार, बलिया

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