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विलीन होती यादें… दोषी कौन, गंगा या प्रशासन ?

मानवीय सभ्यता का इतिहास पढ़ाते वक़्त प्राइमरी कक्षाओं में ये पढ़ाया जाता है कि इंसान ने जब गुफाओं से निकलकर नदियों की ओर पलायन किया तो उसने खेती करने का हुनर सीखा। अनाज को संग्रहीत किया।खेती में ज्यादा लोगों की जरूरत थी तो उसने परिवार बसाना शुरू किया। परिवार से समाज और फिर सभ्यता विकसित हुई। सभ्यता जिसने इंसान को अन्य जानवरों से श्रेष्ठ बनाया। आज उन्हीं नदियों के किनारे के लोग हैरान परेशान हैं।

पिछले एक महीने से बलिया में किनारे के लोग सड़कों पर जीवनयापन करने को मजबूर हैं। हालांकि दो दिनों से गंगा के पानी के बढ़ने की गति में विराम लगा है, लेकिन न रुकने वाली बारिश ने दुश्वारियां और बढ़ा दी हैं। इन दुश्वारियों से इस क्षेत्र की जनता वर्षों से संघर्ष कर रही है। हर वर्ष गंगा की लहरें उग्र रूप लेती हैं। कभी खेत, कभी मकान और कभी गांव के गांव गंगा की लहरों में विलीन हो जाते हैं। मकान जिन्हें दादा-परदादाओं ने ईंट-मिट्टी के साथ अपनी भावनाओं के साथ बनाया था, आज नाती-परनाती अपने कलेजे को कठोर करके उजाड़ रहे हैं। और जो अपना कलेजा कठोर नहीं कर पाते वो स्तब्ध खड़े होकर गंगा की लहरों में जमीन के साथ मकान को विलीन होने का वीभत्स दृश्य देखने को मजबूर हैं।

कश्मीरी पंडितों के विस्थापन का मुद्दा भले ही देश और प्रदेश के चुनावों का मुद्दा बन जाये, लेकिन हर वर्ष हो रहा निर्वासन कोई बड़ा मुद्दा नहीं बनता। देश और प्रदेश के चुनाव भले ही राइजिंग इंडिया और शाइनिंग इंडिया के नारों के साथ लड़ा जाता हो। भले ही हर वर्ष प्रतिव्यक्ति आय और GDP में इजाफे की खबरें सुर्खियों में जगह बनाती हों, पर नदी किनारे के गांवों के भाग्योदय पर सब मौन हैं।

भोला प्रसाद, बलिया

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