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बलिया वाया बनारस : इतिहास की कीमत पर नहीं बनेगा भविष्य

वाराणसी के रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार अजय चतुर्वेदी ने आज फेसबुक पर दो तस्वीरें साझा की है गोदौलिया स्थित पुराने तांगा स्टैंड की, जिस पर हथौड़ा चल रहा है. यह भवन नहीं बनारस का इतिहास भी है, जिसकी कीमत पर हम शानदार भविष्य का सपना देख रहे हैं। सपने देखना उचित है, लेकिन यह भी समझना होगा कि उसकी कीमत क्या है। वरना… भविष्य में पछतावा भी हो सकता है।

बात करीब एक दशक पुरानी है। तब मैं बलिया में ही अमर उजाला अखबार से जुड़ा था। घर से जिला मुख्यालय जाने के रास्ते में ही देश के नामचीन साहित्यकार पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी का गांव ओझवलिया पड़ता है। नेशनल हाइवे से सटे बसरिकापुर मीडिल स्कूल से उन्होंने आठवीं तक की पढ़ाई की थी। ऐसे ही तपती दुपहरी में एक दिन ऑफिस जाते मेरी नजर स्कूल के जर्जर भवन पर पड़ी, जिस पर मजदूर हथौड़ा चला रहे थे। दफ्तर पहुंचने की जल्दी में मैंने रुकना मुनासिब नहीं समझा।

अगले दिन किसी कारण से सुबह ही निकल गया, साे उधर ध्यान नहीं गया। तीसरे दिन जा रहा था तो करीब-करीब नींव दिखने लगी थी. मैं रुक गया। कुछ लोगों ने बताया कि नया भवन बनने वाला है, इसलिए जर्जर भवन को तोड़ा जा रहा है।

इसी बीच एक बुजुर्ग ने कहा कि इसी स्कूल में पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी भी पढ़े थे, जो बगल के गांव के रहने वाले थे। मेरी जिज्ञासा बढ़ी. स्कूल का रिकॉर्ड दिखवाया तो उनका नाम कई दशक पुराने रजिस्टर में मौजूद थे। मैंने मुख्यालय पहुंचकर पहला काम किया तत्कालीन बीएसए से बात करने का।

दरअसल, आचार्य जी से जुड़े होने के कारण यह भवन धरोहर बन सकता था। उसकी मरम्मत हो सकती थी। लेकिन, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। अधिकारी ने भी कुछ करने से हाथ खड़े कर दिए, क्योंकि भवन टूट चुका था। मैं ओझवलिया गांव में गया तो पता चला कि आचार्य जी का मकान भी नहीं है। जहां उनका घर था, आज कोई दूसरा परिवार रहता है। उनकी किताब में बरगद के पेड़ का जिक्र है, उसी आधार पर जगह की पहचान भी हो सकी।

अफसोस, हिंदी साहित्य के जिस पुरोधा के नाम पर हम आज देश-दुनिया में अगराते फिर रहे हैं, उसकी कोई निशानी सहेज कर नहीं रख सके। मैं आज तक इस बात के लिए खुद को भी जिम्मेदार मानता हूं कि दो दिन पहले मैंने गंभीरता से लिया होता, तो कम से कम उस स्कूल को बचा सकता था।

हालांकि बाद में आचार्य जी के नाम पर तत्कालीन सांसद नीरज शेखर ने गांव में कुछ काम कराये। उनकी प्रतिमा भी बनवायी। इसके बाद 2014 में केंद्र सरकार ने सांसदों को गांव गोद लेने को कहा, तो बलिया के सांसद भरत सिंह ने आचार्य जी के गांव ओझवलिया को ही गोद लिया। यह अच्छी पहल थी। लेकिन, हम आचार्य जी से जुड़ी एक भी निशानी को सहेज कर रख पाते, तो बात कुछ अलग होती।

बनारस भी बदल रहा है। बदलना भी चाहिए। लेकिन, जब बनारस से पुरानी चीजें गायब हो जायेंगी, तो हम आने वाली पीढ़ी को क्या दिखाकर बनारस का महत्व समझाऐंगे। बड़ी-बड़ी बिल्डिंग और मॉल निश्चित तौर पर हमारी रइसी को चार चांद लगा सकते हैं, लेकिन वह हमारी धरोहर नहीं बन सकते। हमें मॉल कल्चर तो चाहिए ही, अपनी धरोहरों को भी सहेजना है।

धनंजय पांडेय वरिष्ठ पत्रकार ‘प्रभात खबर’ की फेसबुकवाल से

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