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बेलगाम बोल का भयावह शक्ल

बेलगाम बोल व बदमिजाज कार्यप्रणाली कितना भयावह शक्ल अख्तियार कर सकती है, यह सुभासपा के राष्द्रीय अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर के प्रकरण से साबित हो गया। भाजपा के समर्थन से पहली बार सत्ता सुख लेने वाले ओमप्रकाश राजभर को यह गलतफहमी रही कि वह मायावती व अखिलेश यादव की कोटि के नेता हो गये हैं। इसलिए उन्होंने भाजपा को अपने विवादित बयानों के जरिये हमेशा दबाव में लेने की कोशिश की।

गाजीपुर के जिलाधिकारी से बावेला के बाद भाजपा ने भाव न देकर पहले ही जता दिया कि वह राजभर को भाव नही देगी। इसके बाद राजभर मतों पर वर्चस्व कायम करने के लिये भाजपा ने रणनीति के तहत अनिल राजभर को आगे बढ़ाया। इसके बाद सकलदीप राजभर को राज्यसभा सदस्य बनाया। घोसी सीट को लेकर सौदेबाजी में न आकर भाजपा ने हरिनारायण राजभर पर दांव लगाया। हालांकि राजभर भी इससे बेखबर कभी नही रहे। वह सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव से मिले, लेकिन अखिलेश जी ने अपने दल के टिकट पर राजभर को सलेमपुर से लड़ने का प्रस्ताव दे दिया। राजभर नही माने। उन्हें भरोसा था कि कांग्रेस से बात बन जायेगी, लेकिन प्रियंका गांधी ने इनको कोई महत्व नही दिया।

राजभर लोकसभा चुनाव में अंततोगत्वा अकेले उतरे, लेकिन अपने पुत्र अरविंद को घोसी से लड़ाने का दमखम नही दिखा सकें। चुनाव के अंतिम चरण में राजभर की भद पीट गई। इसका एहसास राजभर को हो गया, इसीलिए उन्होंने बयान दिया कि वह चुनाव जीतने के लिये नही अस्तित्व बचाने के लिये लड़ रहे हैं।

बलिया के वरिष्ठ पत्रकार अनूप हेमकर की समीक्षात्मक रिपोर्ट

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