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राजनीति का बदलता रंग और वेंटिलेटर पर उम्मीदें

राजनीति बड़ी… चीज है जी। अचरज हो रहा है न। होना भी चाहिए। मुझे भी हो रहा है, लोगों के बदलते चेहरे देखकर। जहां हूं (मुजफ्फरपुर, बिहार) वहां भी, और जहां का रहने वाला हूं (बलिया, यूपी) वहां भी। दोनों राज्य पड़ोसी है, सो मिजाज भी तकरीबन मिलता-जुलता है।

लोकतंत्र के उत्सव में आपसी कटुता और संबंधों का बिखराव बहुत करीब से महसूस कर रहा हूं, शायद आप भी कर रहे होंगे। पहले चुनावों में साम्प्रदायिक रंग चटख होते थे, अब जातीय रंग चढ़ रहा है। हमारे मन में हिन्दू-मुस्लिम वाली कड़वाहट ही नहीं है, बल्कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, भूमिहार, कायस्थ, वैश्य, कुर्मी, यादव, दलित…. और न जाने कौन-कौन सी जाति।

अभी पिछले महीने चुनावी हलचल के बीच समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव का बीमार होना और केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह का उनसे मिलने जाना, निश्चित तौर पर शानदार रहा। लेकिन अफसोस, इसका संदेश ग्राउंड लेबल पर नहीं जा सका। निचले स्तर पर इस बदलाव का कुप्रभाव बड़ा असर दिखा रहा है।

अभी कल ही की बात है। बलिया से सपा प्रत्याशी की बहू को लेकर सूचना मिली। संवेदनाओं का तांता लग गया। हालांकि कुछ घंटों बाद अच्छी खबर मिली कि अभी सांस चल रही, अलबत्ता वेंटिलेटर पर है। इसके बाद कई लोग सक्रिय हो गए मजे लेने के लिये। भावनाओं की सारी मर्यादा लांघ दी कुछ पढ़े-लिखे लोगों ने, केवल इसलिये कि चुनाव का मौसम है। उनका आरोप था कि चुनावी लाभ के लिये किसी को झूठे मार दिया गया, जबकि यह साफ हो गया था कि केवल सांस चल रही है, उम्मीदें तो कब का वेंटिलेटर पर है।

लोकसभा चुनाव का नतीजा 23 मई को आना है। यानी अभी 20 दिन और। अभी तीन चरण का मतदान भी होना है। लेकिन इंतजार से क्या फायदा। लोकतंत्र के उत्सव से, लोकतंत्र का हीरो (आम आदमी) ही गायब है। चुनावी मुद्दों में उसकी चर्चा तो दूर-दूर तक नहीं है। यूं कहें तो उसे किनारे करके जातीय समीकरण सेट कर दिया गया है।

धनंजय पाडेय पत्रकार

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