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शायद ये जमाना तय कर दें एक दिन…

सुनो,
तुम मानो या न मानो
पर तुम हो
मेरी जिंदगी की किताब के
वो अध्याय
जिसका शब्द-शब्द
लिखा है मैंने
पूरी निष्ठा व समर्पण से
क्या और कितना के साथ
तुम आज जो ढूँढ़ते हो
मायने मेरे इस समर्पण के
तो सुनो, मेरी ये चुप्पी
एक इशारा है
इस बात का
कि ये तय करना
शायद मेरा-तुम्हारा
काम नहीं
यही तो वो एक चीज है
जिसे छोड़ दिया है
मैंने, जमाने के भरोसे
इस उम्मीद में
कि शायद
ये जमाना
तय कर दें एक दिन
मायने… मेरे लिखे शब्दों के
तेरे नाम के इस अध्याय में !!!
Omkrit

ओम सिंह ‘अप्पू’

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