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चीखते चिल्लाते नारों के बीच अनसुनी आवाजें

देश में सेमी हाईस्पीड वंदे भारत चलने लगी है, प्रतिदिन जहां औसतन 11 किलोमीटर सड़क बनती थी अब 32 किलोमीटर बन रही है, बिजली भरपूर मिल रही है, प्रतिव्यक्ति आय बढ़ गई है तथा और भी बहुत कुछ हो रहा है।

लेकिन बलिया के ग्रामीण अंचल से निकल कर अच्छी पढ़ाई के लिए दिल्ली यूनिवर्सिटी में बीए-एमए करने वाला युवा जिसने एक ठीकठाक सरकारी नौकरी का स्वप्न देखा था वो हताश है।

25 वर्ष के उस युवा का मानना है कि राजनीतिक पार्टियों की जय जयकार करने के लिए उसके पास पूरी उम्र है लेकिन अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अगले पांच साल बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है। जनसंख्या का जितना दबाव हमारे देश में है उस हिसाब से सरकारी नौकरी में श्रम के साथ भाग्य भी प्रभाव डालता है, जुगाड़ भी और सरकार की नीति भी।

साधारण सी बीए-एमए की पढ़ाई करने के लिए बच्चे गांव छोड़कर शहर की और पलायन करते हैं, प्रतिष्ठित सरकारी कॉलेज की फीस हिसाब किताब में हो तो भी शहर में रहने का खर्च पंद्रह से बीस हजार रुपये प्रतिमाह है।

दो-ढाई लाख रुपये प्रतिवर्ष और पांच साल में आठ लाख रुपये खर्च करने वाला गांव-देहात के युवा के ऊपर एक ठीक ठाक नौकरी प्राप्त करने का मानसिक और नैतिक दबाव है,इसीलिए वो अपनी मेहनत में कोई कोताही नहीं बरतेगा,उसे जुगाड़ लगाना होगा तो एड़ियां घिस देगा लेकिन नीति का निर्माण तो सरकार को करना है इसीलिये उसके लिए 33km सड़कों, सेमी हाइस्पीड ट्रेन्स और बढ़ती हुई प्रतिव्यक्ति आय की उद्घोषणा अपने साथ बेमानी सी लगती है। उसके घर की खुशी बुलेट ट्रेन और बढ़ती प्रति व्यक्ति आय न होकर सरकारी नौकरी प्राप्त कर लेने में है।

हिंदी, समाजशास्त्र, इतिहास या अन्य बहुत से मानविकी के विषयों का प्राइवेट क्षेत्र में कोई बड़ा स्कोप भी तो नहीं है।बहुत होगा तो किसी प्राइवेट स्कूल वाले दस हजार रुपये की नौकरी दे देंगे।

आशुतोष ओझा, बलिया

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