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सवाल और सियासत…

लोकतंत्र प्रश्नों पर टिका है। या यूं कहें तो हमारे मौलिक अधिकारों में एक, सवाल पूछना भी है। लेकिन आज इस पर बड़ा संकट है। स्कूलों में हम बच्चों को इस बात के लिए प्रेरित करते है कि सवाल पूछो। इससे दिमाग तेज होता है। लेकिन हम खुद भूल जाते है। दरअसल, सोशल मीडिया का असर इतना हुआ कि हमने अपने दिमाग का इस्तेमाल बंद कर दिया है। अभी हो रहे लोकसभा चुनाव में इसका नजारा दिख रहा है। जो इंसान अपने पार्षद या मुखिया से सवाल नहीं कर सकता, वह भी आपको राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर ज्ञान दे सकता है।

भले ही कुछ उसके पल्ले न पड़े, लेकिन उसकी तमन्ना होगी कि आप उसकी बातें मान लें। इनकार करने पर उसके गुस्से का भी सामना करना पड़ सकता है। हालिया उदाहरण पिछले महीने शक्ति मिसाइल के परीक्षण के दिन दिखा। हर तरफ इस बात की खुशी दिखी कि भारत ने दुश्मन देश का सैटेलाइट मार गिराया। कुलांचे मारने वालों में पढ़े-लिखे लोग ज्यादा थे। खैर, शाम तक सबकुछ क्लियर हो गया। दरअसल हम अपने दिमाग को उपयोग में न लाकर भोथर बना दिये है।

भारतीय धर्म-दर्शन को उसके सबसे ऊंचे स्थान पर पहुंचाने वाले आदि शंकराचार्य एक बार भारती से बहस में हार गए थे। वो महिषि, बिहार की थीं। भारती के पति मंडन मिश्र मिथिलांचल में कोसी नदी के किनारे स्थित महिषि में रहते थे। तब धर्म-दर्शन के क्षेत्र में शंकराचार्य की ख्याति दूर-दूर तक थी। कहा जाता है कि उस वक्त ऐसा कोई ज्ञानी नहीं था, जो शंकराचार्य से धर्म और दर्शन पर शास्त्रार्थ कर सके।

शंकराचार्य देशभर के साधु-संतों और विद्वानों से शास्त्रार्थ करते मंडन मिश्र के गांव तक पहुंचे थे। यहां 42 दिनों तक लगातार हुए शास्त्रार्थ में शंकराचार्य ने हालांकि मंडन को पराजित कर तो दिया, पर उनकी पत्नी के एक सवाल का जवाब नहीं दे पाए और अपनी हार मान ली थी।

मंडन मिश्र गृहस्थ आश्रम में रहने वाले विद्वान थे। उनकी पत्नी भी विदुषी थीं। इस दंपती के घर पहुंचकर शंकराचार्य ने मंडन मिश्र से शास्त्रार्थ करने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने शर्त रखी कि जो हारेगा, वह जीतने वाले का शिष्य बन जाएगा। अब सवाल खड़ा हुआ कि दो विद्वानों के बीच शास्त्रार्थ में हार-जीत का फैसला कौन करेगा। शंकराचार्य को पता था कि मंडन मिश्र की पत्नी भारती विद्वान हैं। उन्होंने उन्हें ही निर्णायक की भूमिका निभाने को कहा।

शंकराचार्य के कहे अनुसार भारती दोनों के बीच होने वाले शास्त्रार्थ का निर्णायक बन गईं। मंडन और शंकराचार्य के बीच 21 दिनों तक शास्त्रार्थ होता रहा। आखिर में मंडन मिश्र शंकराचार्य के एक सवाल का जवाब नहीं दे पाए और उन्हें हारना पड़ा। निर्णायक की हैसियत से भारती ने कहा कि उनके पति हार गए हैं। वे शंकराचार्य के शिष्य बन जाएं और संन्यास की दीक्षा लें। लेकिन भारती ने शंकराचार्य से यह भी कहा कि मैं उनकी पत्नी हूं। अभी मिश्रजी की आधी ही हार हुई है। मेरी हार के साथ ही उनकी पूरी हार होगी। इतना कहते हुए भारती ने शंकराचार्य को शास्त्रार्थ की चुनौती दी।

शंकराचार्य और भारती के बीच भी कई दिनों तक शास्त्रार्थ होता रहा। एक महिला होने के बावजूद उन्होंने शंकराचार्य के हर सवाल का जवाब दिया। वे ज्ञान के मामले में शंकराचार्य से बिल्कुल कम न थीं, लेकिन 21वें दिन भारती को यह लगने लगा कि अब वे शंकराचार्य से हार जाएंगी। उस दिन भारती ने एक ऐसा सवाल कर दिया, जिसका व्यावहारिक ज्ञान के बिना दिया गया शंकराचार्य का जवाब अधूरा समझा जाता। तब शंकराचार्य ने खुद हार स्वीकार कर ली।

धनंजय पांडेय ‘पत्रकार’ की फेसबुक पोस्ट

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