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ज़िन्दगी के कुछ उलझे सवालों से डर लगता है…

फेसबुक की दुनिया में कोई कहता है मेरे एक हजार दोस्त हैं तो कोई कहता है कि पांच हजार दोस्त हो गए हैं। अब दूसरा अकाउंट खोलना पड़ेगा। आश्चर्य होता है कि ऐसी दोस्ती किस काम की है। क्या केवल दोस्त कहलाने के लिए या मन बहलाने के लिए यह सवाल उठता है ? कृष्ण-सुदामा का भी उदाहरण दोस्ती में दिया जाता है। लेकिन अब शायद दोस्ती ‘पहेली’ बनकर ही रह गई है।

“दोस्ती से बढ़कर कोई रिश्ता नहीं”

मैंने सुना है कि बलिया के नगवां गांव के पंडीत जी और जमुवा गांव के सिंह साहब में अटूट मित्रता थी। एक मित्र की सामयिक मौत हो गई। जैसे ही दूसरे मित्र ने सुना कि मित्र नही रहे। वो भी दुनिया को उसी दिन अलविदा कर गए। वाकई दोस्ती से बढ़कर दुनिया में कोई रिश्ता नही। दोस्ती निःस्वार्थ हो तो निश्चित ही वह दोस्ती आजीवन चलती रहेगी। मेरा आप सबसे आग्रह है, कृपया निःस्वार्थ भाव की दोस्ती रखें। स्वार्थी दोस्त अगर हो तो ऐसी दोस्ती की क्या आवश्यकता? जैसे कृष्ण सुदामा की उदाहरण दी जाती है। उसी तरह एक अपना सच्चा दोस्त बनाएं, जो समाज का प्रतिबिंब बन सके। इन्ही शब्दों के साथ धन्यवाद।

नरेन्द्र मिश्र पत्रकार, बलिया

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